उत्तरकाण्ड

अध्याय 24: सीता की गृह-सेवा

6 श्लोक · 24 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

सीता की गृह-सेवा

प्रभु करोड़ों अश्वमेध यज्ञ करते और ब्राह्मणों को अनेक दान देते हैं; वे वेदमार्ग के रक्षक और गुणों से परे हैं। सीता सदा पति के अनुकूल, सुशील और विनम्र रहती हैं। वे प्रभु की प्रभुता जानती हैं और मन लगाकर चरणों की सेवा करती हैं। यद्यपि महल में सेवा में निपुण बहुत से सेवक-सेविकाएँ हैं, फिर भी वे अपने हाथों घर की सेवा करती हैं, उसी विधि से जिससे प्रभु सुख मानें। कौसल्या आदि सब सासुओं की सेवा वे बिना मान-मद के करती हैं। वे उमा, रमा और ब्रह्मा से वन्दित जगदम्बा हैं; देवता उनकी कृपादृष्टि चाहते हैं, पर उनका मन स्वभाव से श्रीराम के चरणकमलों में ही लगा रहता है।

24.1

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे । दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे ॥
श्रुति पथ पालक धरम-धुरन्धर । गुनातीत अरु भोग-पुरन्दर ॥

koṭinha bājimedha prabhu kīnhe | dāna aneka dvijanha kaham̐ dīnhe ||
śruti patha pālaka dharama-dhurandhara | gunātīta aru bhoga-purandara ||

24.2

पति अनुकूल सदा रह सीता । सोभा खानि सुसील बिनीता ॥
जानति कृपासिन्धु प्रभुताई । सेवति चरन-कमल मन लाई ॥

pati anukūla sadā raha sītā | sobhā khāni susīla binītā ||
jānati kṛpāsindhu prabhutāī | sevati carana-kamala mana lāī ||

24.3

जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी । बिपुल सकल सेवा-निधि गुनी ॥
निज कर गृह परिचरजा करई । रामचन्द्र आयसु अनुसरई ॥

jadyapi gṛham̐ sevaka sevakinī | bipula sakala sevā-nidhi gunī ||
nija kara gṛha paricarajā karaī | rāmacandra āyasu anusaraī ||

24.4

जेहि बिधि कृपासिन्धु सुख मानइ । सोइ कर श्री सेवा-विधि जानइ ॥
कौसल्यादि सासु गृह माहीं । सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं ॥

jehi bidhi kṛpāsindhu sukha mānai | soi kara śrī sevā-vidhi jānai ||
kausalyādi sāsu gṛha māhīṃ | sevai sabanhi māna mada nāhīṃ ||

24.5

उमा रमा ब्रह्मादि बन्दिता । जगदम्बा सन्ततमनिन्दिता ॥

umā ramā brahmādi banditā | jagadambā santatamaninditā ||

दो॰ 24दोहा

जासु कृपा-कटाच्छ सुर, चाहत चितव न सोइ ।
राम-पदारविन्द रति, करति सुभावहि खोइ ॥

jāsu kṛpā-kaṭāccha sura, cāhata citava na soi |
rāma-padāravinda rati, karati subhāvahi khoi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0