उत्तरकाण्ड

अध्याय 23: रामराज्य में प्रकृति का वैभव

6 श्लोक · 23 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

रामराज्य में प्रकृति का वैभव

वनों में वृक्ष सदा फूलते-फलते हैं। हाथी और सिंह साथ रहते हैं; पशु-पक्षी अपना स्वाभाविक वैर भूल गए हैं। झुण्ड निर्भय होकर विचरते हैं और शीतल, सुगन्धित पवन बहता है। लताएँ माँगने पर मधु टपकाती हैं, और गायें मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा अन्न से भरी रहती है; त्रेता में सत्ययुग की रीति लौट आई है। राजा को जगत का आत्मा जानकर पर्वत मणियों की खानें प्रकट कर देते हैं। नदियाँ शीतल, मीठा जल बहाती हैं। समुद्र मर्यादा में रहकर किनारों पर रत्न डाल देता है। चन्द्रमा धरती को किरणों से भरता है, सूर्य उतना ही तपता है जितना काम हो, और माँगने पर बादल जल देते हैं।

23.1

फूलहिँ फरहिँ सदा तरु कानन । रहहिँ एक सँग गज पञ्चानन ॥
खग मृग सहज बयर बिसराई । सबन्हि परसपर प्रीति बढ़ाई ॥

phūlahim̐ pharahim̐ sadā taru kānana | rahahim̐ eka sam̐ga gaja pañcānana ||
khaga mṛga sahaja bayara bisarāī | sabanhi parasapara prīti bar̤hāī ||

23.2

कूजहिँ खग मृग नाना बृन्दा । अभय चरहिँ बन करहिँ अनन्दा ॥
सीतल सुरभि पवन बह मन्दा । गूंजत अलि लै बलि मकरन्दा ॥

kūjahim̐ khaga mṛga nānā bṛndā | abhaya carahim̐ bana karahim̐ anandā ||
sītala surabhi pavana baha mandā | gūṃjata ali lai bali makarandā ||

23.3

लता बिटप मागें मधु चवहीं । मन भावतो धेनु पय स्त्रवहीं ॥
ससि सम्पन्न सदा रह धरनी । त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी ॥

latā biṭapa māgeṃ madhu cavahīṃ | mana bhāvato dhenu paya stravahīṃ ||
sasi sampanna sadā raha dharanī | tretām̐ bhai kṛtajuga kai karanī ||

23.4

प्रगटीं गिरिन्ह विविध मनि खानी । जगदातमा भूप जग जानी ॥
सरिता सकल बहहिं बर बारी । सीतल अमल स्वाद सुखकारी ॥

pragaṭīṃ girinha vividha mani khānī | jagadātamā bhūpa jaga jānī ||
saritā sakala bahahiṃ bara bārī | sītala amala svāda sukhakārī ||

23.5

सागर निज मरजादाँ रहहीं । डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं ॥
सरसिज सङ्कुल सकल तड़ागा । अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा ॥

sāgara nija marajādām̐ rahahīṃ | ḍārahiṃ ratna taṭanhi nara lahahīṃ ||
sarasija saṅkula sakala tar̤āgā | ati prasanna dasa disā bibhāgā ||

दो॰ 23दोहा

बिधु महिपूर मयूख न्हि, रबि तप जेतनेहिँ काज ।
मागें बारिद देहिँ जल, रामचन्द्र के राज ॥

bidhu mahipūra mayūkha nhi, rabi tapa jetanehim̐ kāja |
māgeṃ bārida dehim̐ jala, rāmacandra ke rāja ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0