उत्तरकाण्ड

अध्याय 21: रामराज्य में कोई दुःख नहीं

5 श्लोक · 21 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

रामराज्य में कोई दुःख नहीं

रामराज्य में किसी को दैहिक, दैविक या भौतिक ताप नहीं सताता। सब परस्पर प्रेम करते हैं और श्रुति की नीति से अपने धर्म में लगे रहते हैं। धर्म अपने चारों चरणों पर खड़ा है, और पाप सपने में भी नहीं दिखता। नर-नारी सब राम-भक्ति में लीन और परम गति के अधिकारी हैं। किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती, किसी को पीड़ा नहीं; सब सुन्दर और निरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुखी, न मूर्ख। सब दम्भरहित, चतुर, पण्डित, कृतज्ञ हैं, किसी में कपट नहीं। काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं, रामराज्य में चराचर जगत में किसी को काल, कर्म, स्वभाव या गुणों से उपजा दुःख नहीं।

21.1

दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम-राज नहिँ काहुहि ब्यापा ॥
सब नर करहिँ परसपर प्रीती । चलहिँ स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥

daihika daivika bhautika tāpā | rāma-rāja nahim̐ kāhuhi byāpā ||
saba nara karahim̐ parasapara prītī | calahim̐ svadharma nirata śruti nītī ||

21.2

चारिउ चरन धरम जग माहीं । पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीँ ॥
राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ॥

cāriu carana dharama jaga māhīṃ | pūri rahā sapanehum̐ agha nāhīm̐ ||
rāma bhagati rata nara aru nārī | sakala parama gati ke adhikārī ||

21.3

अल्प-मृत्यु नहिँ कवनिउ पीरा । सब सुन्दर सब बिरुज सरीरा ॥
नहिँ दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥

alpa-mṛtyu nahim̐ kavaniu pīrā | saba sundara saba biruja sarīrā ||
nahim̐ daridra kou dukhī na dīnā | nahiṃ kou abudha na lacchana hīnā ||

21.4

सब निर्दंभ धर्मरत पुनी । नर अरु नारि चतुर सब गुनी ॥
सब गुनज्ञ पंडित सब ज्ञानी । सब कृतज्ञ नहिँ कपट सयानी ॥

saba nirdaṃbha dharmarata punī | nara aru nāri catura saba gunī ||
saba gunajña paṃḍita saba jñānī | saba kṛtajña nahim̐ kapaṭa sayānī ||

दो॰ 21दोहा

राम-राज नभगेस सुनु, सचराचर जग माहिँ ।
काल कर्म सुभाव गुन, कृत दुख काहुहि नाहिँ ॥

rāma-rāja nabhagesa sunu, sacarācara jaga māhim̐ |
kāla karma subhāva guna, kṛta dukha kāhuhi nāhim̐ ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0