उत्तरकाण्ड

अध्याय 17: सखाओं को वस्त्र-भूषण, अंगद बैठे रहते हैं

6 श्लोक · 17 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

सखाओं को वस्त्र-भूषण, अंगद बैठे रहते हैं

प्रभु के वचन सुनकर सखा भूल जाते हैं कि वे कौन हैं, कहाँ हैं। वे हाथ जोड़े एकटक देखते रहते हैं, प्रेम के कारण कुछ कह नहीं पाते। उनका प्रेम देखकर प्रभु उन्हें विशेष ज्ञान देते हैं, पर वे बस चरणकमल निहारते रहते हैं। तब प्रभु सुन्दर रंगों के वस्त्र और आभूषण मँगाते हैं। पहले सुग्रीव को पहनाते हैं, वस्त्र भरत ने अपने हाथों सँवारे हैं। प्रभु की प्रेरणा से लक्ष्मण विभीषण को पहनाते हैं। अंगद हिले बिना बैठे रहते हैं; उनकी प्रीति देखकर प्रभु उनसे कुछ नहीं कहते। रघुनाथ जाम्बवान, नील आदि को पहनाते हैं, और वे राम-रूप हृदय में धरकर प्रणाम करके चलते हैं। तब अंगद उठते हैं और सजल नेत्रों से हाथ जोड़कर प्रेम में डूबे वचन कहते हैं।

17.1

सुनि प्रभु बचन मगन सब भये । को हम कहाँ बिसरि तन गये ॥
एकटक रहे जोरि कर आगे । सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे ॥

suni prabhu bacana magana saba bhaye | ko hama kahām̐ bisari tana gaye ||
ekaṭaka rahe jori kara āge | sakahiṃ na kachu kahi ati anurāge ||

17.2

परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा । कहा बिबिध विधि ज्ञान बिसेखा ॥
प्रभु सनमुख कछु कहत न पारहिं । पुनि पुनि चरन-सरोज निहारहिँ ॥

parama prema tinha kara prabhu dekhā | kahā bibidha vidhi jñāna bisekhā ||
prabhu sanamukha kachu kahata na pārahiṃ | puni puni carana-saroja nihārahim̐ ||

17.3

तब प्रभु भूषन बसन मगाए । नाना रङ्ग अनूप सुहाये ॥
सुग्रीवहिं प्रथमहिँ पहिराये । बसन भरत निज़ हाथ बनाये ॥

taba prabhu bhūṣana basana magāe | nānā raṅga anūpa suhāye ||
sugrīvahiṃ prathamahim̐ pahirāye | basana bharata niza hātha banāye ||

17.4

प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराये । लङ्कापति रघुपति मन भाये ॥
अङ्गद बैठ रहा नहिँ डोला । प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला ॥

prabhu prerita lachimana pahirāye | laṅkāpati raghupati mana bhāye ||
aṅgada baiṭha rahā nahim̐ ḍolā | prīti dekhi prabhu tāhi na bolā ||

दो॰ 17 (क)दोहा

जामवन्त नीलादि सब, पहिराये रघुनाथ ।
हियँ धरि राम रूप सब, चले नाइ पद माथ ॥

jāmavanta nīlādi saba, pahirāye raghunātha |
hiyam̐ dhari rāma rūpa saba, cale nāi pada mātha ||

दो॰ 17 (ख)दोहा

तब अङ्गद उठि नाइ सिर, सजल नयन कर जोरि ।
अति बिनीत बोलेउ बचन, मनहुँ प्रेम रस बोरि ॥

taba aṅgada uṭhi nāi sira, sajala nayana kara jori |
ati binīta boleu bacana, manahum̐ prema rasa bori ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0