कहेउँ परम पुनीत इतिहासा । सुनत सवन छूटहिँ भव पासा ॥
प्रनत कल्पतरु करुना पुञ्जा । उपजइ प्रीति राम-पद कञ्जा ॥
kaheum̐ parama punīta itihāsā | sunata savana chūṭahim̐ bhava pāsā ||
pranata kalpataru karunā puñjā | upajai prīti rāma-pada kañjā ||
5 श्लोक · 126 में से 130
भगवान शिव भवानी से कहते हैं कि मैंने परम पवित्र इतिहास कहा, जिसे सुनते ही भव-पाश छूटते हैं और शरणागत के लिए कल्पवृक्ष, करुणा के पुंज श्रीराम के चरण-कमलों में प्रीति उपजती है। जो मन लगाकर यह कथा सुनते हैं, उनके मन, वचन और कर्म से उपजे पाप चले जाते हैं। तीर्थयात्रा, सब साधन, योग, वैराग्य और ज्ञान में निपुणता, अनेक कर्म, धर्म, व्रत और दान, संयम, दम, जप, तप और यज्ञ, जीवों पर दया, ब्राह्मण और गुरु की सेवा, विद्या, विनय और विवेक: वेद जितने साधन बताते हैं, हे भवानी, उन सबका फल हरिभक्ति है। श्रुतियों में गाई वह रघुनाथ-भक्ति राम-कृपा से कोई एक ही पाता है। फिर भी जो विश्वास के साथ यह कथा निरन्तर सुनते हैं, वे मुनियों को दुर्लभ हरिभक्ति बिना प्रयास पा लेते हैं।
कहेउँ परम पुनीत इतिहासा । सुनत सवन छूटहिँ भव पासा ॥
प्रनत कल्पतरु करुना पुञ्जा । उपजइ प्रीति राम-पद कञ्जा ॥
kaheum̐ parama punīta itihāsā | sunata savana chūṭahim̐ bhava pāsā ||
pranata kalpataru karunā puñjā | upajai prīti rāma-pada kañjā ||
मन क्रम करम जनित अघ जाई । सुनहिँ जे कथा श्रवन मन लाई ॥
तीर्थाटन साधन समुदाई । जोग बिराग ग्यान निपुनाई ॥
mana krama karama janita agha jāī | sunahim̐ je kathā śravana mana lāī ||
tīrthāṭana sādhana samudāī | joga birāga gyāna nipunāī ||
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना । सञ्जम दम जप तप मख नाना ॥
भूत दया द्विज गुरु सेवकाई । विद्या विनय बिबेक बड़ाई ॥
nānā karma dharma brata dānā | sañjama dama japa tapa makha nānā ||
bhūta dayā dvija guru sevakāī | vidyā vinaya bibeka bar̤āī ||
जहँ लगि साधन बेद बखानी । सब कर फल हरि भगति भवानी ॥
सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई । राम कृपाँ काहूँ एक पाई ॥
jaham̐ lagi sādhana beda bakhānī | saba kara phala hari bhagati bhavānī ||
so raghunātha bhagati śruti gāī | rāma kṛpām̐ kāhūm̐ eka pāī ||
मुनि दुर्लभ हरि भगति नर, पावहिँ बिनहिं प्रयास ।
जे यह कथा निरन्तर, सुनहिँ मानि विस्वास ॥
muni durlabha hari bhagati nara, pāvahim̐ binahiṃ prayāsa |
je yaha kathā nirantara, sunahim̐ māni visvāsa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0