मैं कृतकृत्य भयउँ तव बानी । सुनि रघुबीर भगति रस सानी ॥
राम चरन नूतन रति भई । माया जनित बिपति सब गई ॥
maiṃ kṛtakṛtya bhayaum̐ tava bānī | suni raghubīra bhagati rasa sānī ||
rāma carana nūtana rati bhaī | māyā janita bipati saba gaī ||
7 श्लोक · 125 में से 130
गरुड़ काकभुशुण्डि से कहते हैं कि रघुवीर-भक्ति में सनी आपकी वाणी से मैं कृतकृत्य हो गया; राम-चरणों में नई प्रीति जागी और माया की विपत्ति चली गई। मोह-समुद्र में आप मेरे जहाज़ बने; इसका प्रत्युपकार मुझसे नहीं हो सकता। सन्त, वृक्ष, नदी और धरती सबके काम पराए हित के लिए हैं। कवियों ने सन्त-हृदय को मक्खन कहा, पर ठीक न कह सके: मक्खन अपने ताप से पिघलता है, सन्त पराए दुःख से। मुझे सदा अपना सेवक जानिए। चरणों में सिर नवाकर, हृदय में रघुवीर को रखकर गरुड़ वैकुण्ठ चले गए। शिव गिरिजा से कहते हैं कि सन्त-समागम के समान कोई लाभ नहीं, और वह हरि-कृपा बिना नहीं मिलता।
मैं कृतकृत्य भयउँ तव बानी । सुनि रघुबीर भगति रस सानी ॥
राम चरन नूतन रति भई । माया जनित बिपति सब गई ॥
maiṃ kṛtakṛtya bhayaum̐ tava bānī | suni raghubīra bhagati rasa sānī ||
rāma carana nūtana rati bhaī | māyā janita bipati saba gaī ||
मोह जलधि बोहित तुम्ह भये । मो कहँ नाथ बिबिध सुख दये ॥
सो पहिँ होइ न प्रति उपकारा । बन्दउँ तव पद बारहिँ बारा ॥
moha jaladhi bohita tumha bhaye | mo kaham̐ nātha bibidha sukha daye ||
so pahim̐ hoi na prati upakārā | bandaum̐ tava pada bārahim̐ bārā ||
पूरन काम राम अनुरागी । तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी ॥
सन्त बिटप सरिता गिरि धरनी । पर हित हेतु सबन्ह के करनी ॥
pūrana kāma rāma anurāgī | tumha sama tāta na kou bar̤abhāgī ||
santa biṭapa saritā giri dharanī | para hita hetu sabanha ke karanī ||
सन्त हृदय नवनीत समाना । कहा कबिन्ह पै कहइ न जाना ॥
निज परिताप द्रवइ नवनीता । पर दुख द्रवहिँ सन्त सुपुनीता ॥
santa hṛdaya navanīta samānā | kahā kabinha pai kahai na jānā ||
nija paritāpa dravai navanītā | para dukha dravahim̐ santa supunītā ||
जीवन जनम सुफल मम भयऊ । तव प्रसाद संसय सब गयऊ ॥
जानेहु सदा मोहि निज किङ्कर । पुनि पुनि उमा कहइ बिहङ्ग बर ॥
jīvana janama suphala mama bhayaū | tava prasāda saṃsaya saba gayaū ||
jānehu sadā mohi nija kiṅkara | puni puni umā kahai bihaṅga bara ||
तासु चरन सिर नाइ करि, प्रेम सहित मतिधीर ।
गयउ गरुड़ बैकुंठ तब, हृदयँ राखि रघुबीर ॥
tāsu carana sira nāi kari, prema sahita matidhīra |
gayau garur̤a baikuṃṭha taba, hṛdayam̐ rākhi raghubīra ||
गिरिजा सन्त समागम, सम न लाभ कछु आन ।
बिनु हरि कृपा न होइ सो, गावहिँ बेद पुरान ॥
girijā santa samāgama, sama na lābha kachu āna |
binu hari kṛpā na hoi so, gāvahim̐ beda purāna ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0