उत्तरकाण्ड

अध्याय 122: उपचार: रघुपति-भक्ति, संजीवनी बूटी

13 श्लोक · 122 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

उपचार: रघुपति-भक्ति, संजीवनी बूटी

काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं कि सब जीव ऐसे ही रोगी हैं, शोक-हर्ष और भय-प्रीति में झूलते। ये रोग बिरले ही पहचानते हैं, और विषयों के कुपथ्य से मुनियों के हृदय में भी अँकुरते हैं। राम-कृपा से संयोग बने तो सब मिटें: सद्गुरु वैद्य, उनके वचनों में विश्वास संयम, रघुपति की भक्ति संजीवनी बूटी, और श्रद्धा उसका अनुपान। आरोग्य का लक्षण है वैराग्य का बल और सुमति की नित नई भूख। शिव, ब्रह्मा, शुक, सनकादि और नारद का मत एक है: राम के चरणों से प्रेम करो। बर्फ से आग निकल आए, पर राम-विमुख को सुख नहीं; बालू से तेल निकल आए, पर हरिभक्तों बिना कोई भवसागर नहीं तरता।

122.1

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी । सोक हरष भय प्रीति बियोगी ॥
मानक रोग कछुक मैं गाये । हैं सब कें लखि बिरलेन्ह पाये ॥

ehi bidhi sakala jīva jaga rogī | soka haraṣa bhaya prīti biyogī ||
mānaka roga kachuka maiṃ gāye | haiṃ saba keṃ lakhi biralenha pāye ||

122.2

जाने से छीजहिं कछु पापी । नास न पावहिं जन परितापी ॥
विषय कुपथ्य पाइ अङ्कुरे । मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे ॥

jāne se chījahiṃ kachu pāpī | nāsa na pāvahiṃ jana paritāpī ||
viṣaya kupathya pāi aṅkure | munihu hṛdayam̐ kā nara bāpure ||

122.3

रामकृपा नाहिं सब रोगा । जौँ एहि भाँति बनइ संयोगा ॥
सदगुरु बैद बचन बिस्वासा । सञ्जम यह न विषय के आसा ॥

rāmakṛpā nāhiṃ saba rogā | jaum̐ ehi bhām̐ti banai saṃyogā ||
sadaguru baida bacana bisvāsā | sañjama yaha na viṣaya ke āsā ||

122.4

रघुपति भगति सजीवन मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ॥
एहि विधि भलेहिं सो रोग नसाहीं । नाहिँ त जतन कोटि नहिं जाहीं ॥

raghupati bhagati sajīvana mūrī | anūpāna śraddhā mati pūrī ||
ehi vidhi bhalehiṃ so roga nasāhīṃ | nāhim̐ ta jatana koṭi nahiṃ jāhīṃ ||

122.5

जानिय तब मन बिरुज गोसाँई । जब उर बल बिराग अधिकाई ॥
सुमति छुधा बाढइ नित नई । विषय आस दुर्बलता गई ॥

jāniya taba mana biruja gosām̐ī | jaba ura bala birāga adhikāī ||
sumati chudhā bāḍhai nita naī | viṣaya āsa durbalatā gaī ||

122.6

बिमल ज्ञान जल जब सो नहाई । तब रह राम भगति उर छाई ॥
सिव अज सुक सनकादिक नारद । जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद ॥

bimala jñāna jala jaba so nahāī | taba raha rāma bhagati ura chāī ||
siva aja suka sanakādika nārada | je muni brahma bicāra bisārada ||

122.7

सब कर मत खगनायक एहा । करिय राम-पद पङ्कज नेहा ॥
श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं । रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ॥

saba kara mata khaganāyaka ehā | kariya rāma-pada paṅkaja nehā ||
śruti purāna saba graṃtha kahāhīṃ | raghupati bhagati binā sukha nāhīṃ ||

122.8

कमठ पीठ जामहिं बरु बारा । बन्ध्या-सुत बरु काहुहि मारा ॥
फूलहिँ नभ बरु बहुबिधि फूला । जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ॥

kamaṭha pīṭha jāmahiṃ baru bārā | bandhyā-suta baru kāhuhi mārā ||
phūlahim̐ nabha baru bahubidhi phūlā | jīva na laha sukha hari pratikūlā ||

122.9

तृषा जाइ बरु मृगजल पाना । बरु जामहिं सस सीस बिषाना ॥
अन्धकार बरु रबिहि नसावै । राम बिमुख न जीव सुख पावै ॥

tṛṣā jāi baru mṛgajala pānā | baru jāmahiṃ sasa sīsa biṣānā ||
andhakāra baru rabihi nasāvai | rāma bimukha na jīva sukha pāvai ||

122.10

हिम से अनल प्रगट बरु होई । बिमुख राम सुख पाव न कोई ॥

hima se anala pragaṭa baru hoī | bimukha rāma sukha pāva na koī ||

दो॰ 122 (क)दोहा

उबारि मथें घृत होइ बरु, सिकता ते बरु तेल ।
बिनु हरिजन न भव तरिअ, यह सिद्धान्त अपेल ॥

ubāri matheṃ ghṛta hoi baru, sikatā te baru tela |
binu harijana na bhava taria, yaha siddhānta apela ||

दो॰ 122 (ख)दोहा

मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु, अजहि मसक तें हीन ।
अस बिचारि तजि संसय, रामहिं भजहिँ प्रबीन ॥

masakahi karai biṃraṃci prabhu, ajahi masaka teṃ hīna |
asa bicāri taji saṃsaya, rāmahiṃ bhajahim̐ prabīna ||

122.श्लो॰ 122(ग)

विनिच्श्रितं वदामि ते न अन्यथा बचांसि मे ।
हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते ॥

vinicśritaṃ vadāmi te na anyathā bacāṃsi me |
hariṃ narā bhajanti ye'tidustaraṃ taranti te ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0