उत्तरकाण्ड

अध्याय 123: भुशुण्डि का समापन, सत्संग से धन्य

6 श्लोक · 123 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

भुशुण्डि का समापन, सत्संग से धन्य

एक संस्कृत श्लोक से आरम्भ होता है, जिसे हमारी फाइल में पिछले दोहे का भाग अंकित किया गया है: मैं निश्चित कहता हूँ, जो हरि को भजते हैं, वे अत्यन्त दुस्तर को तर जाते हैं। काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं कि उन्होंने अपनी मति के अनुसार हरि के चरित विस्तार और संक्षेप में गाए। श्रुति का सिद्धान्त है कि सब कामनाएँ भूलकर राम को भजो। उनके जैसे मूर्ख पर भी ममता रखने वाले प्रभु को छोड़ किसे सेवें? गरुड़ स्वयं विज्ञानरूप हैं; उन्होंने कृपा करके यह पावन रामकथा पुछवाई। पल भर का सत्संग भी दुर्लभ है। पक्षियों में अधम होकर भी प्रभु ने उन्हें पावन बनाया, और आज वे सन्त-समागम से धन्य हैं।

123.1

कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा । व्यास समास स्वमति अनुरूपा ॥
श्रुति सिद्धान्त-इहइ उरगारी । राम भजिअ सब काम बिसारी ॥

kaheum̐ nātha hari carita anūpā | vyāsa samāsa svamati anurūpā ||
śruti siddhānta-ihai uragārī | rāma bhajia saba kāma bisārī ||

123.2

प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही । मोहि से सठ पर ममता जाही ॥
तुम्ह विज्ञानरूप नहिं मोहा । नाथ कीन्ह मो पर अति छोहा ॥

prabhu raghupati taji seia kāhī | mohi se saṭha para mamatā jāhī ||
tumha vijñānarūpa nahiṃ mohā | nātha kīnha mo para ati chohā ||

123.3

पूछेहु रामकथा अति पावनि । सुक सनकादि सम्भु मन भावनि ॥
सत सङ्गति दुर्लभ संसारा । निमिष दंड भरि एकउ बारा ॥

pūchehu rāmakathā ati pāvani | suka sanakādi sambhu mana bhāvani ||
sata saṅgati durlabha saṃsārā | nimiṣa daṃḍa bhari ekau bārā ||

123.4

देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी । मैं रघुबीर भजन अधिकारी ॥
सकुनाधम सब भाँति अपावन । प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन ॥

dekhu garur̤a nija hṛdayam̐ bicārī | maiṃ raghubīra bhajana adhikārī ||
sakunādhama saba bhām̐ti apāvana | prabhu mohi kīnha bidita jaga pāvana ||

दो॰ 123 (क)दोहा

आजु धन्य मैं धन्य अति, जद्यपि सब विधि हीन ।
निज जन जानि राम मोहि, सन्त समागम दीन ॥

āju dhanya maiṃ dhanya ati, jadyapi saba vidhi hīna |
nija jana jāni rāma mohi, santa samāgama dīna ||

दो॰ 123दोहा

नाथ जथामति भाखेउँ, राखेउँ नहिं कछु गोइ ।
चरित सिन्धु रघुनायक, थाह कि पावइ कोइ ॥

nātha jathāmati bhākheum̐, rākheum̐ nahiṃ kachu goi |
carita sindhu raghunāyaka, thāha ki pāvai koi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0