सुन्दरकाण्ड

अध्याय 59: समुद्र की शरण और क्षमा याचना

5 श्लोक · 59 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

समुद्र की शरण और क्षमा याचना

डरा हुआ समुद्र प्रभु के चरण पकड़कर कहता है, नाथ, मेरे अवगुण क्षमा कीजिए। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी स्वभाव से जड़ हैं, आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उपजाया, और प्रभु की दी मर्यादा में रहकर ही ये सुख पाते हैं। आपने अच्छी सीख दी, पर मेरी मर्यादा भी आपकी बनाई है। फिर समुद्र कहता है: ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी, ये सब ताड़ना के अधिकारी हैं। आपके प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना उतर जाएगी, पर इसमें मेरी बड़ाई नहीं। प्रभु की आज्ञा टाली नहीं जाती, जो भाए वही कीजिए। कृपालु मुस्कुराकर कहते हैं, तात, सेना पार उतरने का उपाय बताओ।

59.1

सभय सिन्धु गहि पद प्रभु केरे । छमहु नाथ सब अवगुन मेरे ॥
गगन समीर अनल जल धरनी । इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी ॥

sabhaya sindhu gahi pada prabhu kere | chamahu nātha saba avaguna mere ||
gagana samīra anala jala dharanī | inha kai nātha sahaja jar̤a karanī ||

59.2

तव प्रेरित मायाँ उपजाये । सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाये ॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जसि अहई । सो तेहि भाँति रहे सुख लहई ॥

tava prerita māyām̐ upajāye | sṛṣṭi hetu saba graṃthani gāye ||
prabhu āyasu jehi kaham̐ jasi ahaī | so tehi bhām̐ti rahe sukha lahaī ||

59.3

प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही । मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही ॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी । सकल ताड़ना के अधिकारी ॥

prabhu bhala kīnhī mohi sikha dīnhī | marajādā puni tumharī kīnhī ||
ḍhola gavām̐ra sūdra pasu nārī | sakala tār̤anā ke adhikārī ||

59.4

प्रभु प्रताप मैँ जाब सुखाई । उतरिहि कटक न मोरि बड़ाई ॥
प्रभु आज्ञा अपेल स्रुति गाई । करउ सो बेगि जो तुम्हहिँ सोहाई ॥

prabhu pratāpa maim̐ jāba sukhāī | utarihi kaṭaka na mori bar̤āī ||
prabhu ājñā apela sruti gāī | karau so begi jo tumhahim̐ sohāī ||

दो॰ 59दोहा

सुनत बिनीत बचन अति, कह कृपाल मुसुकाइ ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटक, तात सो कहहु उपाइ ॥

sunata binīta bacana ati, kaha kṛpāla musukāi |
jehi bidhi utarai kapi kaṭaka, tāta so kahahu upāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0