सुन्दरकाण्ड

अध्याय 57: शुक की सीख और समुद्र के तीन दिन

7 श्लोक · 57 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

शुक की सीख और समुद्र के तीन दिन

भीतर से डरा रावण मुस्कुराकर कहता है, यह छोटा तपस्वी धरती पर पड़ा आकाश पकड़ना चाहता है। शुक कहता है, नाथ, सब बातें सच हैं। रघुवीर सब लोकों के राजा होकर भी बहुत कोमल हैं, मिलते ही कृपा करेंगे और कोई अपराध मन में नहीं रखेंगे। जनकसुता रघुनाथ को दे दीजिए। इस पर वह मूर्ख उसे लात मारता है। शुक राम के पास जाकर अपनी कथा कहता है और उनकी कृपा से अपनी गति पाता है। शिवजी बताते हैं, वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य के शाप से राक्षस बना था, बार बार वन्दना कर वह आश्रम लौटता है। तीन दिन बीतते हैं, जड़ समुद्र विनती नहीं मानता। तब राम क्रोध से कहते हैं, भय के बिना प्रीति नहीं होती।

57.1

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई । कहत दसानन सबहि सुनाई ॥
भूमि परा कर गहत अकासा । लघु तापस कर बाग-बिलासा ॥

sunata sabhaya mana mukha musukāī | kahata dasānana sabahi sunāī ||
bhūmi parā kara gahata akāsā | laghu tāpasa kara bāga-bilāsā ||

57.2

कह सुक नाथ सत्य सब बानी । समुझहु छाडि प्रकृति अभिमानी ॥
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा । नाथ राम सन तजहु बिरोधा ॥

kaha suka nātha satya saba bānī | samujhahu chāḍi prakṛti abhimānī ||
sunahu bacana mama parihari krodhā | nātha rāma sana tajahu birodhā ||

57.3

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ । जद्यपि अखिल लोक कर राऊ ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिहीं । उर अपराध न एकउ धरिहीं ॥

ati komala raghubīra subhāū | jadyapi akhila loka kara rāū ||
milata kṛpā tumha para prabhu karihīṃ | ura aparādha na ekau dharihīṃ ||

57.4

जनक-सुता रघुनाथहि दीजे । एतना कहा मोर प्रभु कीजै ॥
जब तेहिं कहा देन कहा बैदेही । चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही ॥

janaka-sutā raghunāthahi dīje | etanā kahā mora prabhu kījai ||
jaba tehiṃ kahā dena kahā baidehī | carana prahāra kīnha saṭha tehī ||

57.5

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ । कृपासिन्धु रघुनायक जहाँ ॥
करि प्रनाम निज कथा सुनाई । राम कृपाँ आपनि गति पाई ॥

nāi carana siru calā so tahām̐ | kṛpāsindhu raghunāyaka jahām̐ ||
kari pranāma nija kathā sunāī | rāma kṛpām̐ āpani gati pāī ||

57.6

रिषि अगस्ति के साप भवानी । राछस भयउ रहा मुनि ज्ञानी ॥
बन्दि राम-पद बारहिँ बारा । मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा ॥

riṣi agasti ke sāpa bhavānī | rāchasa bhayau rahā muni jñānī ||
bandi rāma-pada bārahim̐ bārā | muni nija āśrama kahum̐ pagu dhārā ||

दो॰ 57दोहा

बिनय न मानत जलधि जड़, गये तीनि दिन बीति ।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति ॥

binaya na mānata jaladhi jar̤a, gaye tīni dina bīti |
bole rāma sakopa taba, bhaya binu hoi na prīti ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0