प्रगट बखानहिँ राम सुभाऊ । अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने । सकल बाँधि कपीस पहिँ आने ॥
pragaṭa bakhānahim̐ rāma subhāū | ati saprema gā bisari durāū ||
ripu ke dūta kapinha taba jāne | sakala bām̐dhi kapīsa pahim̐ āne ||
5 श्लोक · 52 में से 60
प्रेम में भरकर दूत अपना छिपाव भूल जाते हैं और खुलकर राम के स्वभाव का बखान करने लगते हैं। तब वानर उन्हें शत्रु के दूत जानकर बाँधकर सुग्रीव के पास लाते हैं। सुग्रीव कहते हैं, वानरो, इन राक्षसों के अंग भंग करके भेज दो। आज्ञा सुनकर वानर उन्हें बाँधकर सेना के चारों ओर घुमाते हैं और बहुत मारते हैं। दूत दीन होकर पुकारते हैं, जो हमारे नाक कान काटे उसे कोसलपति की दुहाई। यह सुनकर लक्ष्मण उन्हें पास बुलाते हैं और दया आने से हँसकर तुरन्त छुड़ा देते हैं। वे कहते हैं, यह पत्र रावण को देना और कहना, कुल के घातक, लक्ष्मण के वचन पढ़। फिर उस मूर्ख से मुँह से मेरा उदार सन्देश कहना: सीता को देकर मिलो, नहीं तो तुम्हारा काल आ गया।
प्रगट बखानहिँ राम सुभाऊ । अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने । सकल बाँधि कपीस पहिँ आने ॥
pragaṭa bakhānahim̐ rāma subhāū | ati saprema gā bisari durāū ||
ripu ke dūta kapinha taba jāne | sakala bām̐dhi kapīsa pahim̐ āne ||
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर । अङ्ग भङ्ग करि पठवहु निसिचर ॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाये । बाँधि कटक चहुँ पास फिराये ॥
kaha sugrīva sunahu saba bānara | aṅga bhaṅga kari paṭhavahu nisicara ||
suni sugrīva bacana kapi dhāye | bām̐dhi kaṭaka cahum̐ pāsa phirāye ||
बहु प्रकार मारन कपि लागे । दीन पुकारत तदपि न त्यागे ॥
जो हमार हर नासा काना । तेहि कोसलाधीस कै आना ॥
bahu prakāra mārana kapi lāge | dīna pukārata tadapi na tyāge ||
jo hamāra hara nāsā kānā | tehi kosalādhīsa kai ānā ||
सुनि लछिमन सब निकट बोलाये । दया लागि हँसि तुरत छोड़ाये ॥
रावन कर दीजहु यह पाती । लछिमन बचन बाचु कुलघाती ॥
suni lachimana saba nikaṭa bolāye | dayā lāgi ham̐si turata chor̤āye ||
rāvana kara dījahu yaha pātī | lachimana bacana bācu kulaghātī ||
कहेहु मुखागर मूढ़ सन, मम सन्देस उदार ।
सीता देह मिलेहु न त, आवा काल तुम्हार ॥
kahehu mukhāgara mūr̤ha sana, mama sandesa udāra |
sītā deha milehu na ta, āvā kāla tumhāra ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0