सुन्दरकाण्ड

अध्याय 51: लक्ष्मण का विरोध, श्रीराम समुद्र तट पर

5 श्लोक · 51 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

लक्ष्मण का विरोध, श्रीराम समुद्र तट पर

श्रीराम कहते हैं, सखा, तुमने अच्छा उपाय बताया, दैव सहायक हो तो यही किया जाए। यह मन्त्र लक्ष्मण के मन को नहीं भाता, नाथ, दैव का क्या भरोसा? मन में क्रोध करके समुद्र को सोख लीजिए। दैव तो कायर मन का एकमात्र सहारा है, आलसी ही दैव दैव पुकारते हैं। सुनकर रघुवीर हँसकर कहते हैं, ऐसा ही करेंगे, मन में धीरज रखो। भाई को समझाकर प्रभु समुद्र को सिर नवाते हैं और तट पर कुश बिछाकर बैठ जाते हैं। उधर जब विभीषण प्रभु के पास आए थे, तभी पीछे से रावण ने दूत भेजे थे। कपट से वानर का शरीर धरकर उन्होंने सब चरित्र देखे और मन में प्रभु के गुणों और शरणागत पर उनके स्नेह की सराहना करने लगे।

51.1

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई । करिय दैव जौँ होइ सहाई ॥
मन्त्र न यह लछिमन मन भावा । राम बचन सुनि अति दुख पावा ॥

sakhā kahī tumha nīki upāī | kariya daiva jaum̐ hoi sahāī ||
mantra na yaha lachimana mana bhāvā | rāma bacana suni ati dukha pāvā ||

51.2

नाथ दैव कर कवन भरोसा । सोषिअ सिन्धु करिय मन रोसा ॥
कादर मन कहँ एक अधारा । दैव दैव आलसी पुकारा ॥

nātha daiva kara kavana bharosā | soṣia sindhu kariya mana rosā ||
kādara mana kaham̐ eka adhārā | daiva daiva ālasī pukārā ||

51.3

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा । ऐसेहिं करन धरहु मन धीरा ॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई । सिन्धु समीप गये रघुराई ॥

sunata bihasi bole raghubīrā | aisehiṃ karana dharahu mana dhīrā ||
asa kahi prabhu anujahi samujhāī | sindhu samīpa gaye raghurāī ||

51.4

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिर नाई । बैठे पुनि तट दर्भ डसाई ॥
जबहिँ बिभीषन प्रभु पहिं आये । पाछें रावन दूत पठाये ॥

prathama pranāma kīnha sira nāī | baiṭhe puni taṭa darbha ḍasāī ||
jabahim̐ bibhīṣana prabhu pahiṃ āye | pācheṃ rāvana dūta paṭhāye ||

दो॰ 51दोहा

सकल चरित तिन्ह देखे, भरे कपट कपि देह ।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिँ, सरनागत पर नेह ॥

sakala carita tinha dekhe, bhare kapaṭa kapi deha |
prabhu guna hṛdayam̐ sarāhahim̐, saranāgata para neha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0