अस कहि चला बिभीषन जबहीं । आयू-हीन भये सब तबहीं ॥
साधु अवज्ञा तुरत भवानी । कर कल्यान अखिल कै हानी ॥
asa kahi calā bibhīṣana jabahīṃ | āyū-hīna bhaye saba tabahīṃ ||
sādhu avajñā turata bhavānī | kara kalyāna akhila kai hānī ||
5 श्लोक · 42 में से 60
जैसे ही विभीषण चले, वैसे ही सब आयुहीन हो गए। शिवजी कहते हैं, भवानी, साधु का अपमान तुरन्त सारे कल्याण का नाश कर देता है। रावण ने जब विभीषण को त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव से हीन हो गया। विभीषण मन में अनेक मनोरथ करते हुए हर्ष से रघुनायक की ओर चलते हैं। वे सोचते हैं, जाकर उन चरणकमलों को देखूँगा जो लाल और कोमल हैं और सेवकों को सुख देते हैं, जिनके स्पर्श से ऋषि की पत्नी तर गई और जिन्होंने दण्डक वन को पवित्र किया। जिन चरणों की पादुकाओं में भरत मन लगाए रहते हैं, आज उन्हीं चरणों को इन आँखों से देखूँगा।
अस कहि चला बिभीषन जबहीं । आयू-हीन भये सब तबहीं ॥
साधु अवज्ञा तुरत भवानी । कर कल्यान अखिल कै हानी ॥
asa kahi calā bibhīṣana jabahīṃ | āyū-hīna bhaye saba tabahīṃ ||
sādhu avajñā turata bhavānī | kara kalyāna akhila kai hānī ||
रावन जबहिँ बिभीषन त्यागा । भयउ विभव बिनु तबहिँ अभागा ॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीँ । करत मनोरथ बहु मन माहीं ॥
rāvana jabahim̐ bibhīṣana tyāgā | bhayau vibhava binu tabahim̐ abhāgā ||
caleu haraṣi raghunāyaka pāhīm̐ | karata manoratha bahu mana māhīṃ ||
देखिहउँ जाइ चरन-जलजाता । अरुन मृदुल सेवक सुख-दाता ॥
जो पद परसि तरी रिषि-नारी । दंडक-कानन पावन-कारी ॥
dekhihaum̐ jāi carana-jalajātā | aruna mṛdula sevaka sukha-dātā ||
jo pada parasi tarī riṣi-nārī | daṃḍaka-kānana pāvana-kārī ||
अरुन मृदुल सेवक सुख-दाता । कपट-कुरङ्ग-सँग, धर धाए ॥
हर उर सर सरोज पद जेई । देखिहउँ जाइ चरन-जलजाता ॥
aruna mṛdula sevaka sukha-dātā | kapaṭa-kuraṅga-sam̐ga, dhara dhāe ||
hara ura sara saroja pada jeī | dekhihaum̐ jāi carana-jalajātā ||
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि, भरत रहे मन लाइ ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ, इन्ह नयनन्हि अब जाइ ॥
jinha pāyanha ke pādukanhi, bharata rahe mana lāi |
te pada āju bilokihaum̐, inha nayananhi aba jāi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0