सुन्दरकाण्ड

अध्याय 40: माल्यवान का समर्थन, विभीषण की पुनः विनती

5 श्लोक · 40 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

माल्यवान का समर्थन, विभीषण की पुनः विनती

सयाने मन्त्री माल्यवान प्रसन्न होकर रावण से कहते हैं, आपके छोटे भाई नीति के भूषण हैं, उनकी बात मानिए। रावण कहता है, ये दोनों मूर्ख शत्रु की बड़ाई करते हैं, कोई इन्हें दूर करे। माल्यवान घर लौट जाते हैं। विभीषण फिर हाथ जोड़कर कहते हैं, पुराण और वेद कहते हैं कि सुमति और कुमति सबके हृदय में रहती हैं, सुमति से सम्पत्ति आती है और कुमति का अन्त विपत्ति है। आपके हृदय में उल्टी कुमति बस गई है, इसी से आप हित को अहित और शत्रु को मित्र मानते हैं, और राक्षस कुल की कालरात्रि सीता से प्रीति करते हैं। तात, चरण पकड़कर माँगता हूँ, सीता राम को दे दीजिए, आपका अहित नहीं होगा।

40.1

माल्यवन्त अति सचिव सयाना । तासु बचन सुनि अति सुख माना ॥
तात अनुज तब नीति-विभूषन । सो उर धरहु जो कहत विभीषन ॥

mālyavanta ati saciva sayānā | tāsu bacana suni ati sukha mānā ||
tāta anuja taba nīti-vibhūṣana | so ura dharahu jo kahata vibhīṣana ||

40.2

रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ । दूरि न करहु इहाँ है कोऊ ॥
माल्यवन्त गृह गयउ बहोरी । कहइ विभीषन पुनि कर जोरी ॥

ripu utakaraṣa kahata saṭha doū | dūri na karahu ihām̐ hai koū ||
mālyavanta gṛha gayau bahorī | kahai vibhīṣana puni kara jorī ||

40.3

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं । नाथ पुरान निगम अस कहहीं ॥
जहाँ सुमति तहँ सम्पति नाना । जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ॥

sumati kumati saba keṃ ura rahahīṃ | nātha purāna nigama asa kahahīṃ ||
jahām̐ sumati taham̐ sampati nānā | jahām̐ kumati taham̐ bipati nidānā ||

40.4

तव उर कुमति बसी बिपरीता । हित अनहित मानहु रिपु प्रीता ॥
कालराति निसिचर-कुल केरी । तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ॥

tava ura kumati basī biparītā | hita anahita mānahu ripu prītā ||
kālarāti nisicara-kula kerī | tehi sītā para prīti ghanerī ||

दो॰ 40दोहा

तात चरन गहि माँगउँ, राखहु मोर दुलार ।
सीत देहु राम कहँ, अहित न होइ तुम्हार ॥

tāta carana gahi mām̐gaum̐, rākhahu mora dulāra |
sīta dehu rāma kaham̐, ahita na hoi tumhāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0