सुन्दरकाण्ड

अध्याय 4: लंकिनी पर प्रहार और सत्संग की महिमा

5 श्लोक · 4 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

लंकिनी पर प्रहार और सत्संग की महिमा

मच्छर जितना रूप धरकर हनुमान नरहरि का स्मरण करते हुए नगर की ओर चलते हैं। नगर की रखवाली करने वाली राक्षसी लंकिनी उन्हें रोककर कहती है, मूर्ख, यहाँ जितने चोर हैं सब मेरा भोजन हैं। कपि उसे एक घूँसा मारते हैं, वह रक्त उगलती हुई धरती पर गिर पड़ती है। फिर वह हाथ जोड़ती है। वह बताती है कि रावण को वर देते समय ब्रह्मा ने मुझे पहचान दी थी: जब वानर की मार से तू व्याकुल हो, तब जानना कि राक्षसों का संहार आ गया। तात, मेरे बड़े पुण्य हैं कि मैंने राम के दूत को अपनी आँखों से देखा। उसका दोहा स्वर्ग और मोक्ष के सब सुख तराजू के एक पलड़े पर रखता है, और वे क्षण भर के सत्संग के सुख की बराबरी नहीं कर पाते।

4.1

मसक समान रूप कपि धरी । लङ्कहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥
नाम लङ्किनी एक निसिचरी । सो कह चलेसि मोहि निन्दरी ॥

masaka samāna rūpa kapi dharī | laṅkahi caleu sumiri naraharī ||
nāma laṅkinī eka nisicarī | so kaha calesi mohi nindarī ||

4.2

जानेहि नहीं मरम सठ मोरा । मोर अहार, जहाँ लगि चोरा ॥
मुठिका एक महा-कपि हनी । रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥

jānehi nahīṃ marama saṭha morā | mora ahāra, jahām̐ lagi corā ||
muṭhikā eka mahā-kapi hanī | rudhira bamata dharanīṃ ḍhanamanī ||

4.3

पुनि सम्भारि उठी सो लङ्का । जोरि पानि कर बिनय संसका ॥
जब रावनहिं ब्रह्म बर दीन्हा । चलत बिरञ्चि कहा मोहि चीन्हा ॥

puni sambhāri uṭhī so laṅkā | jori pāni kara binaya saṃsakā ||
jaba rāvanahiṃ brahma bara dīnhā | calata birañci kahā mohi cīnhā ||

4.4

बिकल होसि तैं कपि कें मारे । तब जानेसु निसिचर सङ्घारे ॥
तात मोर अति पुन्य बहूता । देखेउँ नयन राम कर दूता ॥

bikala hosi taiṃ kapi keṃ māre | taba jānesu nisicara saṅghāre ||
tāta mora ati punya bahūtā | dekheum̐ nayana rāma kara dūtā ||

दो॰ 4दोहा

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख, धरिय तुला एक अङ्ग ।
तूल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सतसङ्ग ॥

tāta svarga apabarga sukha, dhariya tulā eka aṅga |
tūla na tāhi sakala mili, jo sukha lava satasaṅga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0