सुन्दरकाण्ड

अध्याय 38: सभा में विभीषण का परामर्श

5 श्लोक · 38 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

सभा में विभीषण का परामर्श

रावण के ऐसे ही मन्त्री हैं, जो सुना सुनाकर स्तुति करते हैं। तभी विभीषण आकर बड़े भाई के चरणों में सिर नवाते हैं, अपने आसन पर बैठते हैं और आज्ञा पाकर कहते हैं, आपने पूछा है तो आपके हित की कहता हूँ। जो अपना कल्याण, सुयश, सुबुद्धि और शुभ गति चाहे, वह परायी स्त्री के ललाट को चौथ के चन्द्रमा की तरह त्याग दे। चौदह भुवनों का एकमात्र स्वामी भी जीवों से द्रोह करके नहीं टिकता। गुणों का सागर भी हो, थोड़ा भी लोभ हो तो कोई उसे भला नहीं कहता। नाथ, काम, क्रोध, मद और लोभ नरक के रास्ते हैं, इन्हें छोड़कर रघुवीर को भजिए, जिन्हें सन्त भजते हैं।

38.1

सोइ रावन कह बनी सहाई । अस्तुति करहिँ सुनाइ सुनाई ॥
अवसर जाति बिभीषन आवा । भ्राता चरन सीस तेहिं नावा ॥

soi rāvana kaha banī sahāī | astuti karahim̐ sunāi sunāī ||
avasara jāti bibhīṣana āvā | bhrātā carana sīsa tehiṃ nāvā ||

38.2

पुनि सिर नाइ बैठ निज आसन । बोला बचन पाइ अनुसासन ॥
जौँ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता । मति अनुरूप कहउँ हित ताता ॥

puni sira nāi baiṭha nija āsana | bolā bacana pāi anusāsana ||
jaum̐ kṛpāla pūm̐chihu mohi bātā | mati anurūpa kahaum̐ hita tātā ||

38.3

जो आपन चाहै कल्याना । सुजस सुमति सुभ गति सुख नाना ॥
सो पर-नारि लिलार गोसाँई । तजइ चउथि के चन्द कि नाई ॥

jo āpana cāhai kalyānā | sujasa sumati subha gati sukha nānā ||
so para-nāri lilāra gosām̐ī | tajai cauthi ke canda ki nāī ||

38.4

चौदह भुवन एक पति होई । भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई ॥
गुन सागर नागर नर जोऊ । अलप-लोभ भल कहइ न कोऊ ॥

caudaha bhuvana eka pati hoī | bhūtadroha tiṣṭai nahiṃ soī ||
guna sāgara nāgara nara joū | alapa-lobha bhala kahai na koū ||

दो॰ 38दोहा

काम क्रोध मद लोभ सब, नाथ नरक के पन्थ ।
सन परिहरि रघुबीरही, भजहु भजहिँ जेहि सन्त ॥

kāma krodha mada lobha saba, nātha naraka ke pantha |
sana parihari raghubīrahī, bhajahu bhajahim̐ jehi santa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0