देह बिसाल परम हरुआई । मन्दिर तेँ मन्दिर चढ़ धाई ॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला । झपट लपट बहु कोटि कराला ॥
deha bisāla parama haruāī | mandira tem̐ mandira car̤ha dhāī ||
jarai nagara bhā loga bihālā | jhapaṭa lapaṭa bahu koṭi karālā ||
5 श्लोक · 26 में से 60
विशाल पर बहुत हल्के शरीर से हनुमान एक महल से दूसरे पर दौड़ते हैं। नगर जल रहा है, करोड़ों भयानक लपटें उठ रही हैं, और पुकार सुनाई देती है, हाय पिता, हाय माता, अब हमें कौन बचाएगा? लोग कहते हैं, हमने तो कहा था यह वानर नहीं, वानर रूप में कोई देवता है। साधु के अपमान का यही फल है, नगर अनाथ के नगर जैसा जल रहा है। पल भर में सारी लंका जल जाती है, केवल विभीषण का घर नहीं। शिवजी गिरिजा से कहते हैं, जिसने अग्नि रची, हनुमान उसके दूत हैं, इसलिए नहीं जले। कपि समुद्र में कूदकर पूँछ बुझाते हैं, फिर छोटा रूप धरकर हाथ जोड़े सीता के सामने खड़े होते हैं।
देह बिसाल परम हरुआई । मन्दिर तेँ मन्दिर चढ़ धाई ॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला । झपट लपट बहु कोटि कराला ॥
deha bisāla parama haruāī | mandira tem̐ mandira car̤ha dhāī ||
jarai nagara bhā loga bihālā | jhapaṭa lapaṭa bahu koṭi karālā ||
तात मातु हा सुनिय पुकारा । एहि अवसर को हमहिँ उबारा ॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई । बानर रूप धरें सुर कोई ॥
tāta mātu hā suniya pukārā | ehi avasara ko hamahim̐ ubārā ||
hama jo kahā yaha kapi nahiṃ hoī | bānara rūpa dhareṃ sura koī ||
साधु अवज्ञा कर फल ऐसा । जरइ नगर अनाथ कर जैसा ॥
जारा नगर निमिष एक माहीँ । एक बिभीषन कर गृह नाहीं ॥
sādhu avajñā kara phala aisā | jarai nagara anātha kara jaisā ||
jārā nagara nimiṣa eka māhīm̐ | eka bibhīṣana kara gṛha nāhīṃ ||
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा । जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ॥
उलटि पलटि लङ्का सब जारी । कूदि परा पुनि सिन्धु मँझारी ॥
tā kara dūta anala jehiṃ sirijā | jarā na so tehi kārana girijā ||
ulaṭi palaṭi laṅkā saba jārī | kūdi parā puni sindhu mam̐jhārī ||
पूँछि बुझाइ खोइ श्रम, धरि लघुरूप बहोरि ।
जनक-सुता के आगें, ठाढ़ भयउ कर जोरि ॥
pūm̐chi bujhāi khoi śrama, dhari laghurūpa bahori |
janaka-sutā ke āgeṃ, ṭhār̤ha bhayau kara jori ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0