हनुमान कहते हैं, श्रीराम के चरणकमल हृदय में रखो और लंका पर अचल राज करो। ऋषि पुलस्त्य का यश निर्मल चन्द्रमा है, उसमें कलंक मत बनो। राम नाम के बिना वाणी वैसे ही शोभा नहीं पाती जैसे सब गहनों से सजी स्त्री वस्त्र के बिना। राम से विमुख की सम्पत्ति और प्रभुता पाई हुई भी न पाई के बराबर है, जैसे बिना सोते की नदियाँ वर्षा बीतते ही सूख जाती हैं। मैं प्रण करके कहता हूँ, हज़ारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी राम के द्रोही को नहीं बचा सकते। मोह की जड़ और बहुत पीड़ा देने वाले अभिमान को छोड़ो और कृपासिन्धु रघुनायक को भजो।