सुन्दरकाण्ड

अध्याय 23: राम से विमुख की सम्पत्ति नहीं टिकती

5 श्लोक · 23 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

राम से विमुख की सम्पत्ति नहीं टिकती

हनुमान कहते हैं, श्रीराम के चरणकमल हृदय में रखो और लंका पर अचल राज करो। ऋषि पुलस्त्य का यश निर्मल चन्द्रमा है, उसमें कलंक मत बनो। राम नाम के बिना वाणी वैसे ही शोभा नहीं पाती जैसे सब गहनों से सजी स्त्री वस्त्र के बिना। राम से विमुख की सम्पत्ति और प्रभुता पाई हुई भी न पाई के बराबर है, जैसे बिना सोते की नदियाँ वर्षा बीतते ही सूख जाती हैं। मैं प्रण करके कहता हूँ, हज़ारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी राम के द्रोही को नहीं बचा सकते। मोह की जड़ और बहुत पीड़ा देने वाले अभिमान को छोड़ो और कृपासिन्धु रघुनायक को भजो।

23.1

राम चरन-पङ्कज उर धरहू । लङ्का अचल राज तुम्ह करहू ॥
रिषि पुलस्ति जस बिमल मंयका । जेहि ससि महुँ जनि होहु कलङ्का ॥

rāma carana-paṅkaja ura dharahū | laṅkā acala rāja tumha karahū ||
riṣi pulasti jasa bimala maṃyakā | jehi sasi mahum̐ jani hohu kalaṅkā ||

23.2

राम नाम बिनु गिरा न सोहा । देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ॥
बसन हीन नहिँ सोह सुरारी । सब भूषन भूषित बर नारी ॥

rāma nāma binu girā na sohā | dekhu bicāri tyāgi mada mohā ||
basana hīna nahim̐ soha surārī | saba bhūṣana bhūṣita bara nārī ||

23.3

राम बिमुख सम्पति प्रभुताई । जाइ रही पाई बिनु पाई ॥
सजल-मूल जिन्ह सरितन्ह नाहिँ । बरषि गये पुनि ताहि सुखाहीं ॥

rāma bimukha sampati prabhutāī | jāi rahī pāī binu pāī ||
sajala-mūla jinha saritanha nāhim̐ | baraṣi gaye puni tāhi sukhāhīṃ ||

23.4

सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी । बिमुख राम त्राता नहिँ कोपी ॥
सङ्कर सहस बिष्नु अज तोही । सकहिँ न राखि राम कर द्रोही ॥

sunu dasakaṃṭha kahaum̐ pana ropī | bimukha rāma trātā nahim̐ kopī ||
saṅkara sahasa biṣnu aja tohī | sakahim̐ na rākhi rāma kara drohī ||

दो॰ 23दोहा

मोह मूल बहु सूल प्रद, त्यागहु तम अभिमान ।
भजहु राम रघुनायक, कृपा सिन्धु भगवान ॥

moha mūla bahu sūla prada, tyāgahu tama abhimāna |
bhajahu rāma raghunāyaka, kṛpā sindhu bhagavāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0