जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई । सहसबाहु सन परी लराई ॥
समर बालि सन करि जसु पावा । सुनि कपि बचन बिहँसि बिहरावा ॥
jānaum̐ maiṃ tumhāri prabhutāī | sahasabāhu sana parī larāī ||
samara bāli sana kari jasu pāvā | suni kapi bacana biham̐si biharāvā ||
6 श्लोक · 22 में से 60
हनुमान कहते हैं, मैं तुम्हारी प्रभुता जानता हूँ, सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई और बालि से लड़कर तुमने यश पाया। रावण हँसकर बात टाल देता है। कपि कहते हैं, भूख लगी थी तो फल खाए, वानर स्वभाव से पेड़ तोड़े। सबको अपनी देह प्यारी है, जिन्होंने मुझे मारा उन्हें मैंने मारा, फिर तुम्हारे पुत्र ने मुझे बाँधा। मुझे बँधने की लाज नहीं, मैं प्रभु का काम करना चाहता हूँ। रावण, हाथ जोड़कर विनती है, अभिमान छोड़ो, अपने कुल का विचार करो और भक्तों का भय हरने वाले को भजो। जिनसे काल भी डरता है उनसे बैर मत करो। जानकी लौटा दो। करुणासिन्धु रघुनायक तुम्हारा अपराध भुलाकर शरण देंगे।
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई । सहसबाहु सन परी लराई ॥
समर बालि सन करि जसु पावा । सुनि कपि बचन बिहँसि बिहरावा ॥
jānaum̐ maiṃ tumhāri prabhutāī | sahasabāhu sana parī larāī ||
samara bāli sana kari jasu pāvā | suni kapi bacana biham̐si biharāvā ||
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा । कपि सुभाव तेँ तोरेउँ रूखा ॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी । मारहिँ मोहि कुमारग-गामी ॥
khāyaum̐ phala prabhu lāgī bhūm̐khā | kapi subhāva tem̐ toreum̐ rūkhā ||
saba keṃ deha parama priya svāmī | mārahim̐ mohi kumāraga-gāmī ||
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे । तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे ॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा । कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ॥
jinha mohi mārā te maiṃ māre | tehi para bām̐dheu tanayam̐ tumhāre ||
mohi na kachu bām̐dhe kai lājā | kīnha cahaum̐ nija prabhu kara kājā ||
बिनती करउँ जोरि कर रावन । सुनहु मान तजि मोर सिखावन ॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी । भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ॥
binatī karaum̐ jori kara rāvana | sunahu māna taji mora sikhāvana ||
dekhahu tumha nija kulahi bicārī | bhrama taji bhajahu bhagata bhaya hārī ||
जाकें डर अति काल डेराई । जो सुर असुर चराचर खाई ॥
तासोँ बैर कबहुँ नहिं कीजै । मोरे कहें जानकी दीजै ॥
jākeṃ ḍara ati kāla ḍerāī | jo sura asura carācara khāī ||
tāsom̐ baira kabahum̐ nahiṃ kījai | more kaheṃ jānakī dījai ||
प्रनतपाल रघुनायक, करुना सिन्धु खरारि ।
गये सरन प्रभु राखिहैं, तव अपराध बिसारि ॥
pranatapāla raghunāyaka, karunā sindhu kharāri |
gaye sarana prabhu rākhihaiṃ, tava aparādha bisāri ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0