ब्रह्मबान कपि कहँ तेहि मारा । परतिहुँ बार कटक सङ्घारा ॥
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ । नागपास बाँधेसि लेइ गयऊ ॥
brahmabāna kapi kaham̐ tehi mārā | paratihum̐ bāra kaṭaka saṅghārā ||
tehi dekhā kapi muruchita bhayaū | nāgapāsa bām̐dhesi lei gayaū ||
5 श्लोक · 20 में से 60
ब्रह्मबाण लगने पर गिरते गिरते भी हनुमान सेना का संहार करते हैं। मेघनाद उन्हें नागपाश में बाँधकर ले जाता है। शिवजी कहते हैं, भवानी, जिनका नाम जपकर ज्ञानी संसार के बन्धन काट देते हैं, क्या उनका दूत बँध सकता है? प्रभु के काम के लिए कपि ने स्वयं को बँधवाया। तमाशा देखने राक्षस सभा में दौड़ आते हैं। रावण की सभा की प्रभुता कही नहीं जाती, देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े डरते हुए उसकी भौंहें देखते हैं। कपि के मन में कोई शंका नहीं, जैसे साँपों के बीच गरुड़ निडर रहते हैं। रावण उन्हें देखकर हँसता है और दुर्वचन कहता है, फिर पुत्र का वध याद कर दुखी होता है।
ब्रह्मबान कपि कहँ तेहि मारा । परतिहुँ बार कटक सङ्घारा ॥
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ । नागपास बाँधेसि लेइ गयऊ ॥
brahmabāna kapi kaham̐ tehi mārā | paratihum̐ bāra kaṭaka saṅghārā ||
tehi dekhā kapi muruchita bhayaū | nāgapāsa bām̐dhesi lei gayaū ||
जासु नाम जपि सुनहु भवानी । भव-बन्धन काटहिं नर ज्ञानी ॥
तासु दूत कि बन्ध तर आवा । प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ॥
jāsu nāma japi sunahu bhavānī | bhava-bandhana kāṭahiṃ nara jñānī ||
tāsu dūta ki bandha tara āvā | prabhu kāraja lagi kapihiṃ bam̐dhāvā ||
कपि-बन्धन सुनि निसिचर धाये । कौतुक लागि सभाँ सब आये ॥
दसमुख-सभा दीखि कपि जाई । कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥
kapi-bandhana suni nisicara dhāye | kautuka lāgi sabhām̐ saba āye ||
dasamukha-sabhā dīkhi kapi jāī | kahi na jāi kachu ati prabhutāī ||
कर जोरें सुर दिसिप विनीता । भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥
देखि प्रताप न कपि मन सङ्का । जिमि अहि-गन महँ गरुड़ असङ्का ॥
kara joreṃ sura disipa vinītā | bhṛkuṭi bilokata sakala sabhītā ||
dekhi pratāpa na kapi mana saṅkā | jimi ahi-gana maham̐ garur̤a asaṅkā ||
कपिहि बिलोकि दसानन, बिहसा कहि दुर्बाद ।
सुत-बध-सुरति कीन्ह पुनि, उपजा हृदयँ बिषाद ॥
kapihi biloki dasānana, bihasā kahi durbāda |
suta-badha-surati kīnha puni, upajā hṛdayam̐ biṣāda ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0