सुन्दरकाण्ड

अध्याय 17: सीता का आशीर्वाद और फल खाने की आज्ञा

6 श्लोक · 17 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

सीता का आशीर्वाद और फल खाने की आज्ञा

भक्ति और बल से भरी कपि की वाणी सुनकर सीता सन्तुष्ट होती हैं। राम का प्रिय जानकर आशीष देती हैं: पुत्र, अजर, अमर, बल, शील और गुणों की निधि बनो, रघुनायक तुम पर बहुत स्नेह करें। प्रभु कृपा करें, यह सुनते ही हनुमान प्रेम में डूबकर बार बार चरणों में सिर नवाते हैं। माता, अब मैं कृतार्थ हुआ, आपका आशीर्वाद अमोघ है। फिर कहते हैं, मुझे बड़ी भूख लगी है और पेड़ों पर सुन्दर फल हैं। सीता कहती हैं, इस वन की रखवाली बड़े बलवान राक्षस करते हैं। कपि कहते हैं, आप प्रसन्न हों तो मुझे उनका डर नहीं। उनकी बुद्धि और बल देखकर जानकी कहती हैं, जाओ पुत्र, रघुपति के चरण हृदय में रखकर मीठे फल खाओ।

17.1

मन सन्तोष सुनत कपि बानी । भगति-प्रताप-तेज-बल-सानी ॥
आसिष दीन्हि राम प्रिय जाना । होहु तात बल-सील-निधाना ॥

mana santoṣa sunata kapi bānī | bhagati-pratāpa-teja-bala-sānī ||
āsiṣa dīnhi rāma priya jānā | hohu tāta bala-sīla-nidhānā ||

17.2

अजर अमर गुन-निधि सुत होहू । करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना । निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ॥

ajara amara guna-nidhi suta hohū | karahum̐ bahuta raghunāyaka chohū ||
karahum̐ kṛpā prabhu asa suni kānā | nirbhara prema magana hanumānā ||

17.3

बार बार नाएसि पद सीसा । बोला बचन जोरि कर कीसा ॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता । आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥

bāra bāra nāesi pada sīsā | bolā bacana jori kara kīsā ||
aba kṛtakṛtya bhayaum̐ maiṃ mātā | āsiṣa tava amogha bikhyātā ||

17.4

सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा । लागि देखि सुन्दर फल रूखा ॥
सुनु सुत करहिँ विपिन रखवारी । परम सुभट रजनीचर भारी ॥

sunahu mātu mohi atisaya bhūkhā | lāgi dekhi sundara phala rūkhā ||
sunu suta karahim̐ vipina rakhavārī | parama subhaṭa rajanīcara bhārī ||

17.5

तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीँ । जौँ तुम्ह सुख मानहु मन माहीं ॥

tinha kara bhaya mātā mohi nāhīm̐ | jaum̐ tumha sukha mānahu mana māhīṃ ||

दो॰ 17दोहा

देखि बुद्धि-बल-निपुन कपि, कहेउ जानकीं जाहु ।
रघुपति-चरन हृदयँ धरि, तात मधुर फल खाहु ॥

dekhi buddhi-bala-nipuna kapi, kaheu jānakīṃ jāhu |
raghupati-carana hṛdayam̐ dhari, tāta madhura phala khāhu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0