कहेउ राम बियोग तव सीता । मो कह सकल भये बिपरीता ॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू । कालनिसा सम निसि ससि-भानू ॥
kaheu rāma biyoga tava sītā | mo kaha sakala bhaye biparītā ||
nava taru kisalaya manahum̐ kṛsānū | kālanisā sama nisi sasi-bhānū ||
6 श्लोक · 15 में से 60
हनुमान राम के वचन सुनाते हैं: सीता, तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सब उल्टा हो गया। नये पत्ते आग से लगते हैं, रात कालरात्रि सी, चन्द्रमा सूर्य सा तपता है। बादल मानो खौलता तेल बरसाते हैं और शीतल पवन साँप की साँस जैसा लगता है। कहने से दुख घटता है, पर किससे कहूँ? प्रिये, हमारे प्रेम का तत्व केवल मेरा मन जानता है, और वह मन सदा तुम्हारे पास रहता है। सन्देश सुनकर वैदेही प्रेम में ऐसी मग्न होती हैं कि देह की सुध नहीं रहती। कपि कहते हैं, माता, धीरज धरो, राम की प्रभुता मन में लाओ और कायरता छोड़ो। राक्षस पतंगे हैं और रघुपति के बाण आग, उन्हें जला हुआ ही जानो।
कहेउ राम बियोग तव सीता । मो कह सकल भये बिपरीता ॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू । कालनिसा सम निसि ससि-भानू ॥
kaheu rāma biyoga tava sītā | mo kaha sakala bhaye biparītā ||
nava taru kisalaya manahum̐ kṛsānū | kālanisā sama nisi sasi-bhānū ||
कुबलय विपिन कुन्त बन सरिसा । बारिद तपत तेल जनु वरिसा ॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा । उरग स्वास सम त्रिबिधि समीरा ॥
kubalaya vipina kunta bana sarisā | bārida tapata tela janu varisā ||
je hita rahe karata tei pīrā | uraga svāsa sama tribidhi samīrā ||
कहेहू तेँ कछु दुख घटि होई । काहि कहउँ यह जान न कोई ॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा । जानत प्रिया एक मन मोरा ॥
kahehū tem̐ kachu dukha ghaṭi hoī | kāhi kahaum̐ yaha jāna na koī ||
tatva prema kara mama aru torā | jānata priyā eka mana morā ||
सो मन सदा रहत तोहि पाहीं । जानु प्रीति रस एतेनहि माहीँ ॥
प्रभु सन्देस सुनत बैदेही । मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही ॥
so mana sadā rahata tohi pāhīṃ | jānu prīti rasa etenahi māhīm̐ ||
prabhu sandesa sunata baidehī | magana prema tana sudhi nahiṃ tehī ||
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता । सुमिरु राम सेवक-सुख दाता ॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई । सुनि मम बचन तजहु कदराई ॥
kaha kapi hṛdayam̐ dhīra dharu mātā | sumiru rāma sevaka-sukha dātā ||
ura ānahu raghupati prabhutāī | suni mama bacana tajahu kadarāī ||
निसिचर निकर पतङ्ग सम, रघुपति बान कृसानु ।
जननी हृदयँ धीर धरु, जरे निसाचर जानु ॥
nisicara nikara pataṅga sama, raghupati bāna kṛsānu |
jananī hṛdayam̐ dhīra dharu, jare nisācara jānu ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0