सुन्दरकाण्ड

अध्याय 13: मुद्रिका और राम के दूत का परिचय

7 श्लोक · 13 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

मुद्रिका और राम के दूत का परिचय

राम नाम से अंकित मुद्रिका देखकर सीता पहचान लेती हैं। हृदय में हर्ष और विषाद दोनों उठते हैं, अजेय रघुराई को कौन जीत सकता है, और माया से यह बन नहीं सकती। तभी छिपे हुए हनुमान मधुर स्वर में रामचन्द्र के गुण और आरम्भ से सारी कथा सुनाते हैं, और सीता का दुख भाग जाता है। वे कहती हैं, जिसने कानों में यह अमृत डाला, वह प्रकट क्यों नहीं होता? कपि पास आते हैं: माता, मैं राम का दूत हूँ, करुणानिधान की शपथ, यह मुद्रिका प्रभु ने आपके लिए पहचान दी है। नर और वानर का संग कैसे हुआ, वे पूछती हैं, और कपि बताते हैं। प्रेम भरे वचन सुनकर उन्हें विश्वास होता है कि यह मन, वचन, कर्म से कृपासिन्धु का दास है।

13.1

तब देखी मुद्रिका मनोहर । राम-नाम-अंकित अति सुन्दर ॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी । हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ॥

taba dekhī mudrikā manohara | rāma-nāma-aṃkita ati sundara ||
cakita citava mudarī pahicānī | haraṣa biṣāda hṛdayam̐ akulānī ||

13.2

जीति को सकइ अजय रघुराई । माया तें असि रचि नहिं जाई ॥
सीता मन बिचार कर नाना । मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥

jīti ko sakai ajaya raghurāī | māyā teṃ asi raci nahiṃ jāī ||
sītā mana bicāra kara nānā | madhura bacana boleu hanumānā ||

13.3

रामचन्द्र गुन बरनइ लागा । सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥
लागीँ सुनैं स्रवन मन लाई । आदिहु तेँ सब कथा सुनाई ॥

rāmacandra guna baranai lāgā | sunatahiṃ sītā kara dukha bhāgā ||
lāgīm̐ sunaiṃ sravana mana lāī | ādihu tem̐ saba kathā sunāī ||

13.4

स्रवनामृत जेहिं कथा सुनाई । कहिं सो प्रगट होत किन भाई ॥
तब हनुमन्त निकट चलि गयऊ । फिरि बैठी मन बिसमय भयऊ ॥

sravanāmṛta jehiṃ kathā sunāī | kahiṃ so pragaṭa hota kina bhāī ||
taba hanumanta nikaṭa cali gayaū | phiri baiṭhī mana bisamaya bhayaū ||

13.5

राम-दूत मैं मातु जानकी । सत्य सपथ करुनानिधान की ॥
यह मुद्रिका मातु मैँ आनी । दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी ॥

rāma-dūta maiṃ mātu jānakī | satya sapatha karunānidhāna kī ||
yaha mudrikā mātu maim̐ ānī | dīnhi rāma tumha kaham̐ sahidānī ||

13.6

नर बानरहि सङ्ग कहु कैसें । कही कथा भइ सङ्गति जैसें ॥

nara bānarahi saṅga kahu kaiseṃ | kahī kathā bhai saṅgati jaiseṃ ||

दो॰ 13दोहा

कपि के बचन सप्रेम सुनि, उपजा मन विस्वास ।
जाना मन क्रम बचन यह, कृपासिन्धु कर दास ॥

kapi ke bacana saprema suni, upajā mana visvāsa |
jānā mana krama bacana yaha, kṛpāsindhu kara dāsa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0