प्रभु क्षण भर में सारी माया काट देते हैं, जैसे सूर्य उगते ही अँधेरा फट जाता है। एक ही रावण देखकर देवता फूल बरसाते हैं। रघुनाथ भुजा उठाकर वानरों को लौटाते हैं। देवताओं को स्तुति करते देख रावण क्रोध में सोचता है कि इनके हिसाब से मैं अब अकेला रह गया, और आकाश में उनकी ओर दौड़ता है। देवता हाहाकार करके भागते हैं। तब अंगद कूदकर उसके पैर पकड़ते हैं, धरती पर पटककर लात मारते हैं और प्रभु के पास लौट जाते हैं। रावण सँभलकर घोर गर्जना करता है, दसों धनुषों पर बाण चढ़ाकर बरसाता है और योद्धाओं को घायल करता है। तब रघुपति उसके सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष काटते हैं, पर वे फिर बहुत बढ़ जाते हैं, जैसे तीर्थ में किए पाप बढ़ते हैं।
गहि भूमि पार्यो लात मार्, बालि-सुत प्रभु पहिँ गयो । सँभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो ॥ करि दाप चाप चढ़ाई दस सन्धानि तर बहु बरई । किए सकल भट घायल भयाकुल, देखि निज बल हरषई ॥