लंकाकाण्ड

अध्याय 92: कटते ही फिर उग आते सिर और भुजाएँ

9 श्लोक · 92 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

कटते ही फिर उग आते सिर और भुजाएँ

पंख वाले सर्पों जैसे बाण पहले रावण के सारथी और घोड़ों को मारते हैं, फिर रथ, ध्वजा और पताका तोड़ डालते हैं। वह दूसरे रथ पर चढ़कर तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र छोड़ता है, पर सब दूसरों से द्रोह करने वाले के उद्यम की तरह निष्फल होते हैं। वह दस शूल चलाकर प्रभु के चारों घोड़े गिरा देता है; प्रभु घोड़ों को उठाकर क्रोध में बाण छोड़ते हैं। दसों मस्तकों में दस-दस बाण लगते हैं और रक्त बहता है। तीस बाणों से रघुवीर भुजाओं समेत सब सिर काट गिराते हैं। वे तुरन्त फिर नए हो जाते हैं। आकाश कटे सिरों और भुजाओं से ऐसे भर जाता है मानो अनेक राहु-केतु हों। जैसे विषय-सेवन से कामना नित नई बढ़ती है, वैसे ही सिर बढ़ते जाते हैं।

92.1

चले बान सपच्छ जनु उरगा । प्रथमहिँ हतेउ सारथी तुरगा ॥
रथ बिभंजि हति केतु पताका । गर्जा अति अन्तर बल थाका ॥

cale bāna sapaccha janu uragā | prathamahim̐ hateu sārathī turagā ||
ratha bibhaṃji hati ketu patākā | garjā ati antara bala thākā ||

92.2

तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना । अस्त्र सत्र छाँड़ेसि विधि नाना ॥
बिफल होहिं सब उद्यम ता के । जिमि पर द्रोह निरत-मनसा के ॥

turata āna ratha car̤hi khisiānā | astra satra chām̐r̤esi vidhi nānā ||
biphala hohiṃ saba udyama tā ke | jimi para droha nirata-manasā ke ||

92.3

तब रावन दस सूल चलावा । बाजि चारि महि मारि गिरावा ॥
तुरग उठाइ कोपि रघुनायक । खैंचि सरासन छाँड़े सायक ॥

taba rāvana dasa sūla calāvā | bāji cāri mahi māri girāvā ||
turaga uṭhāi kopi raghunāyaka | khaiṃci sarāsana chām̐r̤e sāyaka ||

92.4

रावन सिर-सरोज बन चारी । चलि रघुवीर सिलीमुख धारी ॥
दस दस बान भाल दस मारे । निसरि गये चले रुधिर पनारे ॥

rāvana sira-saroja bana cārī | cali raghuvīra silīmukha dhārī ||
dasa dasa bāna bhāla dasa māre | nisari gaye cale rudhira panāre ||

92.5

स्त्रवत रुधिर धायउ बलवाना । प्रभु पुनि कृत धनु सर सन्धाना ॥
तीस तीर रघुवीर पबारे । भुजन्हि समेत सीस महि पारे ॥

stravata rudhira dhāyau balavānā | prabhu puni kṛta dhanu sara sandhānā ||
tīsa tīra raghuvīra pabāre | bhujanhi sameta sīsa mahi pāre ||

92.6

काटतहीं पुनि भए नबीने । राम बहोरि भुजा सिर छीने ॥
प्रभु बहु बार बाहु सिर हये । कटत झटिति पुनि नूतन भए ॥

kāṭatahīṃ puni bhae nabīne | rāma bahori bhujā sira chīne ||
prabhu bahu bāra bāhu sira haye | kaṭata jhaṭiti puni nūtana bhae ||

92.7

पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा । अति कौतुकी कोसलाधीसा ॥
रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू । मानहुँ अमित केतु अरु राहू ॥

puni puni prabhu kāṭata bhuja sīsā | ati kautukī kosalādhīsā ||
rahe chāi nabha sira aru bāhū | mānahum̐ amita ketu aru rāhū ||

92.छं॰ 1छन्द

जनु राहु केतु अनेक नभ पथ, स्त्रवत सोनित धावहीँ ।
रघुबीर तीर प्रचंड लागहिँ, भूमि गिरन न पावहीं ॥
एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं ।
जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ-तहँ विधुन्तुद पोहहीं ॥

janu rāhu ketu aneka nabha patha, stravata sonita dhāvahīm̐ |
raghubīra tīra pracaṃḍa lāgahim̐, bhūmi girana na pāvahīṃ ||
eka eka sara sira nikara chede nabha ur̤ata imi sohahīṃ |
janu kopi dinakara kara nikara jaham̐-taham̐ vidhuntuda pohahīṃ ||

दो॰ 92दोहा

जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर, तिमि तिमि होहिं अपार ।
सेवत विषय बिबर्ध जिमि, नित नित नूतन मार ॥

jimi jimi prabhu hara tāsu sira, timi timi hohiṃ apāra |
sevata viṣaya bibardha jimi, nita nita nūtana māra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0