लंकाकाण्ड

अध्याय 9: प्रहस्त की सलाह: पहले दूत भेजो

6 श्लोक · 9 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

प्रहस्त की सलाह: पहले दूत भेजो

प्रहस्त कहता है: पिताजी, ये मंत्री ठकुरसुहाती कहते हैं, इससे काम पूरा नहीं होगा। एक ही वानर समुद्र लाँघकर आया था, जिसका चरित्र सब आज तक मन में गाते हैं। जब वह नगर जला रहा था, तब उसे पकड़कर क्यों न खा लिया? सुनने में अच्छी लगने वाली सलाह आगे दुख देती है। जिसने खेल में समुद्र बँधवा दिया और सेना सहित सुवेल पर उतर आया, क्या उस मनुष्य को हम खा लेंगे? मेरी बात आदर से सुनिए, मुझे कायर न समझिए। प्रिय बोलने और सुनने वाले संसार में बहुत हैं, कठोर पर परम हितकारी बात कहने-सुनने वाले थोड़े। पहले दूत भेजिए, सीता देकर प्रीति कीजिए। वे पत्नी पाकर लौट जाएँ तो झगड़ा न बढ़ाइए, नहीं तो रणभूमि में डटकर लड़िए।

9.1

कहहिँ सचिव सठ ठकुरसोहाती । नाथ न पूर आव एहि भाँती ॥
बारिधि नाँघि एक कपि आवा । तासु चरित मन महँ सब गावा ॥

kahahim̐ saciva saṭha ṭhakurasohātī | nātha na pūra āva ehi bhām̐tī ||
bāridhi nām̐ghi eka kapi āvā | tāsu carita mana maham̐ saba gāvā ||

9.2

छुधा न रही तुम्हहिँ तब काहू । जारत नगर कस न धरि खाहू ॥
सुनत नीक आगें दुख पावा । सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा ॥

chudhā na rahī tumhahim̐ taba kāhū | jārata nagara kasa na dhari khāhū ||
sunata nīka āgeṃ dukha pāvā | sacivana asa mata prabhuhi sunāvā ||

9.3

जेहिं बारीस बँधायउ हेला । उतरेउ सेन-समेत सुबेला ॥
सो भनु मनुज खाब हम भाई । बचन कहहिँ सत्र गाल फुलाई ॥

jehiṃ bārīsa bam̐dhāyau helā | utareu sena-sameta subelā ||
so bhanu manuja khāba hama bhāī | bacana kahahim̐ satra gāla phulāī ||

9.4

तात बचन मम सुनु अति आदर । जनि मन गुनहु मोहि करि कादर ॥
प्रिय बानी जे सुनहिँ जे कहहीं । ऐसे नर निकाय जग अहहीँ ॥

tāta bacana mama sunu ati ādara | jani mana gunahu mohi kari kādara ||
priya bānī je sunahim̐ je kahahīṃ | aise nara nikāya jaga ahahīm̐ ||

9.5

बचन परम-हित सुनत कठोरे । सुनहिँ जे कहहिँ ते नर प्रभु थोरे ॥
प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती । सीता देइ करहु पुनि प्रीती ॥

bacana parama-hita sunata kaṭhore | sunahim̐ je kahahim̐ te nara prabhu thore ||
prathama basīṭha paṭhau sunu nītī | sītā dei karahu puni prītī ||

दो॰ 9दोहा

नारि पाई फिरि जाहिँ जौँ, तो न बढ़ाइअ रारि ।
नाहिँ त सनमुख समर-महि, तात करिय हठि मारि ॥

nāri pāī phiri jāhim̐ jaum̐, to na bar̤hāia rāri |
nāhim̐ ta sanamukha samara-mahi, tāta kariya haṭhi māri ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0