लंकाकाण्ड

अध्याय 88: भूत-प्रेतों का उत्सव और रावण का माया-विचार

7 श्लोक · 88 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

भूत-प्रेतों का उत्सव और रावण का माया-विचार

रक्त की नदी में भूत, पिशाच और बेताल नहाते हैं। कौए और कंक कटी भुजाएँ लेकर उड़ते हैं और एक-दूसरे से छीनकर खाते हैं; कोई कहता है, इतनी बहुतायत में भी तेरी भूख नहीं जाती। घायल योद्धा किनारे पर कराहते हुए अधडूबे-से पड़े हैं। गीध आँतें ऐसे खींचते हैं मानो मछली पकड़ रहे हों। योगिनियाँ खप्पर भरती हैं, भूत-पिशाचों की स्त्रियाँ आकाश में नाचती हैं, चामुण्डा तरह-तरह से गाती हैं। करोड़ों धड़ बिना सिर दौड़ते हैं, धरती पर पड़े सिर जय-जय बोलते हैं। राम के बाणों से मारे गए वीर रणभूमि में सो रहे हैं और वानर गर्वित हैं। रावण मन में सोचता है: निशाचरों का संहार हो गया, मैं अकेला हूँ और वानर-भालू बहुत; अब मैं अपार माया रचूँगा।

88.1

मज्जहिं भूत पिसाच बेताला । प्रमथ महा झोटिंग कराला ॥
काक कङ्क लै भुजा उड़ाहीं । एक ते छीनि एक लै खाहीं ॥

majjahiṃ bhūta pisāca betālā | pramatha mahā jhoṭiṃga karālā ||
kāka kaṅka lai bhujā ur̤āhīṃ | eka te chīni eka lai khāhīṃ ||

88.2

एक कहहिँ ऐसिउ सौंघाई । सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई ॥
कहँरत भट घायल तट गिरे । जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे ॥

eka kahahim̐ aisiu sauṃghāī | saṭhahu tumhāra daridra na jāī ||
kaham̐rata bhaṭa ghāyala taṭa gire | jaham̐ taham̐ manahum̐ ardhajala pare ||

88.3

खैंचहिं गीध आँत तट भये । जनु बंसी खेलत चित दये ॥
बहु भट बहहिँ चढ़े खग जाहीं । जनु नावरि खेलहिँ सरि माहीं ॥

khaiṃcahiṃ gīdha ām̐ta taṭa bhaye | janu baṃsī khelata cita daye ||
bahu bhaṭa bahahim̐ car̤he khaga jāhīṃ | janu nāvari khelahim̐ sari māhīṃ ||

88.4

जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं । भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं ॥
भट कपाल करताल बजावहिं । चामुंडा नाना विधि गावहिं ॥

jogini bhari bhari khappara saṃcahiṃ | bhūta pisāca badhū nabha naṃcahiṃ ||
bhaṭa kapāla karatāla bajāvahiṃ | cāmuṃḍā nānā vidhi gāvahiṃ ||

88.5

जम्बुक निकर कटक्कट कट्टहिं । खाहिँ हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं ॥
कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं । सीस परे महि जय जय बोलहिं ॥

jambuka nikara kaṭakkaṭa kaṭṭahiṃ | khāhim̐ huāhiṃ aghāhiṃ dapaṭṭahiṃ ||
koṭinha ruṃḍa muṃḍa binu ḍollahiṃ | sīsa pare mahi jaya jaya bolahiṃ ||

88.छं॰ 1छन्द

बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं ।
खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं, सुभट भटन्ह ढहावहीं ॥
बानर निसाचर निकर मर्दहिं, मालु कपि दर्पित भये ।
संग्राम-अङ्गन सुभट सोवहिं, राम-सर निकरन्हि हये ॥

bollahiṃ jo jaya jaya muṃḍa ruṃḍa pracaṃḍa sira binu dhāvahīṃ |
khapparinha khagga alujjhi jujjhahiṃ, subhaṭa bhaṭanha ḍhahāvahīṃ ||
bānara nisācara nikara mardahiṃ, mālu kapi darpita bhaye |
saṃgrāma-aṅgana subhaṭa sovahiṃ, rāma-sara nikaranhi haye ||

दो॰ 88दोहा

रावन हृदयँ विचारा, भा निसिचर संघार ।
मैं अकेल कपि भालु बहु, माया करउँ अपार ॥

rāvana hṛdayam̐ vicārā, bhā nisicara saṃghāra |
maiṃ akela kapi bhālu bahu, māyā karaum̐ apāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0