लंकाकाण्ड

अध्याय 85: वानरों द्वारा रावण का यज्ञ विध्वंस

6 श्लोक · 85 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

वानरों द्वारा रावण का यज्ञ विध्वंस

विभीषण रघुनाथ से कहते हैं: नाथ, रावण यज्ञ कर रहा है, वह सिद्ध हुआ तो यह अभागा नहीं मरेगा, वीर वानरों को शीघ्र भेजकर उसे नष्ट करवाइए। सवेरे प्रभु हनुमान, अंगद आदि को भेजते हैं। वे निडर रावण के भवन में घुसकर उसे यज्ञ करते देखते हैं। अंगद कहते हैं: निर्लज्ज, रण से भागकर यहाँ बगुले जैसा ध्यान लगाए बैठा है, और उसे लात मारते हैं। जब वह फिर भी नहीं देखता, तो वानर उसे दाँतों और लातों से मारते हैं और उसकी स्त्रियों को बाल पकड़कर बाहर खींच लाते हैं, जो दीन होकर पुकारती हैं। रावण काल के समान उठकर वानरों को पैर पकड़कर पटकता है। वानर प्रभु के पास लौटते हैं और रावण जीवन की आशा छोड़कर क्रोध में निकल पड़ता है।

85.1

इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई । सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई ॥
नाथ करइ रावन एक जागा । सिद्ध भये नहिँ मरिहि अभागा ॥

ihām̐ bibhīṣana saba sudhi pāī | sapadi jāi raghupatihi sunāī ||
nātha karai rāvana eka jāgā | siddha bhaye nahim̐ marihi abhāgā ||

85.2

पठवहु देव बेगि भट बन्दर । करहिँ बिधंस आव दसकन्धर ॥
प्रात होत प्रभु सुभट पठाये । हनुमदादि अङ्गद सब धाये ॥

paṭhavahu deva begi bhaṭa bandara | karahim̐ bidhaṃsa āva dasakandhara ||
prāta hota prabhu subhaṭa paṭhāye | hanumadādi aṅgada saba dhāye ||

85.3

कौतुक कूदि चढ़े कपि लङ्का । पैठे रावन भवन असङ्का ॥
जग्य करत जबहीं से देखा । सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा ॥

kautuka kūdi car̤he kapi laṅkā | paiṭhe rāvana bhavana asaṅkā ||
jagya karata jabahīṃ se dekhā | sakala kapinha bhā krodha biseṣā ||

85.4

रन से निलज भाजि गृह आवा । इहाँ आइ बक-ध्यान लगावा ॥
अस कहि अङ्गद मारा लाता । चितव न सठ स्वारथ मन राता ॥

rana se nilaja bhāji gṛha āvā | ihām̐ āi baka-dhyāna lagāvā ||
asa kahi aṅgada mārā lātā | citava na saṭha svāratha mana rātā ||

85.छं॰ 1छन्द

नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि, दसन लातन्ह मारहीं ।
धरि केस नारि निकारि बाहेर, तेऽतिदीन पुकारहीं ॥
तब उठेउ क्रुद्ध कृतान्त सम गहि चरन बानर डारई ।
एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई ॥

nahiṃ citava jaba kari kopa kapi gahi, dasana lātanha mārahīṃ |
dhari kesa nāri nikāri bāhera, te'tidīna pukārahīṃ ||
taba uṭheu kruddha kṛtānta sama gahi carana bānara ḍāraī |
ehi bīca kapinha bidhaṃsa kṛta makha dekhi mana mahum̐ hāraī ||

दो॰ 85दोहा

जग्य बिधंसि कुसल कपि, आए रघुपति पास ।
चलेउ निसाचर क्रुद्ध होइ, त्यागि जिवन कै आस ॥

jagya bidhaṃsi kusala kapi, āe raghupati pāsa |
caleu nisācara kruddha hoi, tyāgi jivana kai āsa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0