लंकाकाण्ड

अध्याय 86: रावण का कूच और रण के लिए सजे श्रीराम

7 श्लोक · 86 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

रावण का कूच और रण के लिए सजे श्रीराम

रावण के चलते ही भयंकर अपशकुन होते हैं और गिद्ध उसके सिरों पर आ बैठते हैं, पर वह काल के वश में है और युद्ध के नगाड़े बजवाता है। हाथी, रथ, पैदल और घुड़सवारों की अपार निशाचर सेना प्रभु पर ऐसे दौड़ती है जैसे पतंगे आग पर। देवता विनती करते हैं: इसने हमें दारुण विपत्ति दी है, अब इसे और न खिलाइए, वैदेही बहुत दुःखी हैं। प्रभु मुस्कुराकर उठते हैं और बाण सँभालते हैं। तुलसीदास उनका रूप खींचते हैं: फूलों से गुँथा जटाजूट, लाल नेत्र, मेघ जैसा श्याम शरीर, कमर में तरकश, हाथ में शार्ङ्ग धनुष, छाती पर भृगु का चरणचिह्न। प्रभु के धनुष घुमाते ही ब्रह्माण्ड, शेष, पृथ्वी, समुद्र और पर्वत डगमगा जाते हैं। देवता फूल बरसाकर पृथ्वी का भार हरने वाले प्रभु की जय बोलते हैं।

86.1

चलत होहिँ अति असुभ भयङ्कर । बैठहिँ गीध उड़ाइ सिरन्ह पर ॥
भयउ कालबस काहु न माना । कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना ॥

calata hohim̐ ati asubha bhayaṅkara | baiṭhahim̐ gīdha ur̤āi siranha para ||
bhayau kālabasa kāhu na mānā | kahesi bajāvahu juddha nisānā ||

86.2

चली तमीचर अनी अपारा । बहु गज-रथ-पदाति-असवारा ॥
प्रभु सनमुख धाये खल कैसे । सलभ-समूह अनल कहँ जैसे ॥

calī tamīcara anī apārā | bahu gaja-ratha-padāti-asavārā ||
prabhu sanamukha dhāye khala kaise | salabha-samūha anala kaham̐ jaise ||

86.3

इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही । दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही ॥
अब जनि राम खेलावहु एही । अतिसय दुखित होति बैदेही ॥

ihām̐ devatanha astuti kīnhī | dāruna bipati hamahi ehiṃ dīnhī ||
aba jani rāma khelāvahu ehī | atisaya dukhita hoti baidehī ||

86.4

देव बचन सुनि प्रभु मुसकाना । उठि रघुवीर सुधारे बाना ॥
जटा-जूट हुद बाँधे माथे । सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे ॥

deva bacana suni prabhu musakānā | uṭhi raghuvīra sudhāre bānā ||
jaṭā-jūṭa huda bām̐dhe māthe | sohahiṃ sumana bīca bica gāthe ||

86.5

अरुन-नयन बारिद-तनु-स्यामा । अखिल-लोक लोचनाभिरामा ॥
कटितट परिकर कस्यो निषङ्गा । कर कोदंड कठिन सारंगा ॥

aruna-nayana bārida-tanu-syāmā | akhila-loka locanābhirāmā ||
kaṭitaṭa parikara kasyo niṣaṅgā | kara kodaṃḍa kaṭhina sāraṃgā ||

86.छं॰ 1छन्द

सारङ्ग कर सुन्दर निषङ्ग सिलीमुखाकर कटि कस्यो ।
भुजदंड पीन मनोहरायत,-उर-धरासुर-पद-लस्यो ॥
कह दास तुलसी जबहिँ प्रभु सर, चाप कर फेरन लगे ।
ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि, सिन्धु भूधर डगमगे ॥

sāraṅga kara sundara niṣaṅga silīmukhākara kaṭi kasyo |
bhujadaṃḍa pīna manoharāyata,-ura-dharāsura-pada-lasyo ||
kaha dāsa tulasī jabahim̐ prabhu sara, cāpa kara pherana lage |
brahmāṃḍa diggaja kamaṭha ahi mahi, sindhu bhūdhara ḍagamage ||

दो॰ 86दोहा

सोभा देखि हरषि सुर बरषहिँ सुमन अपार ।
जय जय प्रभु गुन-ज्ञान-बल, धाम हरन महि भार ॥

sobhā dekhi haraṣi sura baraṣahim̐ sumana apāra |
jaya jaya prabhu guna-jñāna-bala, dhāma harana mahi bhāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0