लंकाकाण्ड

अध्याय 82: रावण का प्रहार और लक्ष्मण का रण में जाना

6 श्लोक · 82 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

रावण का प्रहार और लक्ष्मण का रण में जाना

रावण अत्यन्त क्रोध में दौड़ता है और वानर हुंकार करते हुए सामने आते हैं। वे एक साथ पर्वत, वृक्ष और शिलाएँ उस पर फेंकते हैं, पर उसके वज्र जैसे शरीर से टकराकर पत्थर टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। क्रोध में वह इधर-उधर झपटकर वानर योद्धाओं को मसलने लगता है। भालू और वानर भागते हैं, अंगद, हनुमान और तार भी, और पुकारते हैं: रघुवीर, रक्षा कीजिए, यह दुष्ट काल की तरह खा रहा है। फिर वह दसों धनुषों पर बाण चढ़ाकर छोड़ता है; वे सर्पों की तरह उड़कर धरती, आकाश और सब दिशाएँ भर देते हैं, वानरों को भागने की जगह नहीं मिलती। सेना को व्याकुल देख लक्ष्मण तरकश कसकर, धनुष लेकर, श्रीराम के चरणों में सिर नवाकर क्रोध में चल पड़ते हैं।

82.1

धायउ परम क्रुद्ध दसकन्धर । सन्मुख चले हूह दै बन्दर ॥
गहि गिरि पादप उपल पहारा । डारेन्हि ता कपि एकहिं बारा ॥

dhāyau parama kruddha dasakandhara | sanmukha cale hūha dai bandara ||
gahi giri pādapa upala pahārā | ḍārenhi tā kapi ekahiṃ bārā ||

82.2

लागहिँ सैल बज्र तन तासू । खंड खंड होइ फूटहिं आसू ॥
चला न अचल रहा रथ रोपी । रन दुर्मद रावन अति कोपी ॥

lāgahim̐ saila bajra tana tāsū | khaṃḍa khaṃḍa hoi phūṭahiṃ āsū ||
calā na acala rahā ratha ropī | rana durmada rāvana ati kopī ||

82.3

इत उत झपटि दपटि कपि जोधा । मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा ॥
चले पराइ भालु कपि नाना । तारा सहित अङ्गद हनुमाना ॥

ita uta jhapaṭi dapaṭi kapi jodhā | mardai lāga bhayau ati krodhā ||
cale parāi bhālu kapi nānā | tārā sahita aṅgada hanumānā ||

82.4

पाहि पाहि रघुबीर गोसाँई । यह खल खाइ काल की नाई ॥
तेहि देखे कपि सकल पराने । दसहुँ चाप सायक सन्धाने ॥

pāhi pāhi raghubīra gosām̐ī | yaha khala khāi kāla kī nāī ||
tehi dekhe kapi sakala parāne | dasahum̐ cāpa sāyaka sandhāne ||

82.छं॰ 1छन्द

सन्धानि धनु सर निकर छाडेसि, उरग जिमि उडि लागहीं ।
रहे पूरि सर धरनी-गगन-दिसि,-बिदसि कहँ कपि भागहीं ॥
भयो अति-कोलाहल बिकल कपि, दल भालु बोलहिँ आतुरे ।
रघुबीर करुना सिन्धु आरत, बन्धु जन-रच्छक हरे ॥

sandhāni dhanu sara nikara chāḍesi, uraga jimi uḍi lāgahīṃ |
rahe pūri sara dharanī-gagana-disi,-bidasi kaham̐ kapi bhāgahīṃ ||
bhayo ati-kolāhala bikala kapi, dala bhālu bolahim̐ āture |
raghubīra karunā sindhu ārata, bandhu jana-racchaka hare ||

दो॰ 82दोहा

निज-दल बिकल देखि कटि, कसि निषङ्ग धनु हाथ ।
लछिमन चले क्रुद्ध होइ, लाइ राम-पद-माथ ॥

nija-dala bikala dekhi kaṭi, kasi niṣaṅga dhanu hātha |
lachimana cale kruddha hoi, lāi rāma-pada-mātha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0