लंकाकाण्ड

अध्याय 75: मेघनाद का यज्ञ भंग करने लक्ष्मण का प्रस्थान

8 श्लोक · 75 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

मेघनाद का यज्ञ भंग करने लक्ष्मण का प्रस्थान

मूर्च्छा टूटने पर मेघनाद पिता के सामने लज्जित होता है और अजेय होने का यज्ञ करने पर्वत की गुफा में चला जाता है। विभीषण सलाह देते हैं: नाथ, वह मायावी अपवित्र यज्ञ कर रहा है; सिद्ध हो गया तो उसे जल्दी जीता न जा सकेगा। रघुनाथ अंगद आदि से कहते हैं: लक्ष्मण के साथ जाकर यज्ञ नष्ट करो। लक्ष्मण, तुम उसे रण में मारना। जाम्बवान, सुग्रीव और विभीषण सेना के साथ रहें। लक्ष्मण धनुष-बाण सजाकर मेघ जैसी वाणी में कहते हैं: आज उसे मारे बिना लौटूँ तो रघुनाथ का सेवक न कहलाऊँ; सौ शंकर भी सहायता करें तो भी राम की दुहाई, उसे मारूँगा। प्रभु के चरणों में सिर नवाकर वे अंगद, नल, नील और हनुमान के साथ चल पड़ते हैं।

75.1

मेघनाद के मुरछा जागी । पितहि बिलोकि लाज अति लागी ॥
तुरत गयउ गिरिवर-कंदरा । करउँ अजय-नख अस मन धरा ॥

meghanāda ke murachā jāgī | pitahi biloki lāja ati lāgī ||
turata gayau girivara-kaṃdarā | karaum̐ ajaya-nakha asa mana dharā ||

75.2

इहाँ बिभीषन मन्त्र बिचारा । सुनहु नाथ बल अतुल उदारा ॥
मेघनाद मख करइ अपावन । खल मायाबी देव सतावन ॥

ihām̐ bibhīṣana mantra bicārā | sunahu nātha bala atula udārā ||
meghanāda makha karai apāvana | khala māyābī deva satāvana ||

75.3

जौँ प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि । नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि ॥
सुनि रघुपति अतिसय सुख माना । बोले अङ्गदादि कपि नाना ॥

jaum̐ prabhu siddha hoi so pāihi | nātha begi puni jīti na jāihi ||
suni raghupati atisaya sukha mānā | bole aṅgadādi kapi nānā ||

75.4

लछिमन सङ्ग जाहु सब भाई । करहु बिधंस जग्य कर जाई ॥
तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही । देखि सभय सुर दुख अति मोही ॥

lachimana saṅga jāhu saba bhāī | karahu bidhaṃsa jagya kara jāī ||
tumha lachimana mārehu rana ohī | dekhi sabhaya sura dukha ati mohī ||

75.5

मारेहु तेहि बल-बुद्धि-उपाई । जेहिं छीजै निसिचर सुनु आई ॥
जामवन्त सुग्रीव बिभीषन । सेन समेत रहेहु तीनिउ जन ॥

mārehu tehi bala-buddhi-upāī | jehiṃ chījai nisicara sunu āī ||
jāmavanta sugrīva bibhīṣana | sena sameta rahehu tīniu jana ||

75.6

जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन । कटि निषंग कसि साजि सरासन ॥
मनु प्रताप उर धरि रनधीरा । बोले घन इव गिरा गम्भीरा ॥

jaba raghubīra dīnhi anusāsana | kaṭi niṣaṃga kasi sāji sarāsana ||
manu pratāpa ura dhari ranadhīrā | bole ghana iva girā gambhīrā ||

75.7

जौँ तेहि आजु बधें बिनु आवउँ । तौ रघुपति सेवक न कहावौं ॥
जौं सत-सङ्कर करहिँ सहाई । तदपि हतउँ रन राम-दोहाई ॥

jaum̐ tehi āju badheṃ binu āvaum̐ | tau raghupati sevaka na kahāvauṃ ||
jauṃ sata-saṅkara karahim̐ sahāī | tadapi hataum̐ rana rāma-dohāī ||

दो॰ 75दोहा

रघुपति-चरन नाइ सिरु, चलेउ तुरन्त अनन्त ।
अङ्गद नील मयन्द नल, सङ्ग सुभट हनुमन्त ॥

raghupati-carana nāi siru, caleu turanta ananta |
aṅgada nīla mayanda nala, saṅga subhaṭa hanumanta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0