लंकाकाण्ड

अध्याय 65: कुम्भकर्ण का वानर-सेना पर प्रहार, सुग्रीव का हरण

6 श्लोक · 65 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

कुम्भकर्ण का वानर-सेना पर प्रहार, सुग्रीव का हरण

विभीषण लौटकर श्रीराम से कहते हैं कि पर्वत जैसे शरीर वाला कुम्भकर्ण लड़ने आ रहा है। सुनते ही वानर किलकारी मारकर दौड़ते हैं और पेड़-पहाड़ उखाड़कर उस पर फेंकते हैं। करोड़ों शिखर एक साथ लगते हैं, पर वह ज़रा नहीं डिगता, जैसे मदार के फलों की मार से हाथी नहीं हिलता। पवनपुत्र घूँसा मारते हैं तो वह व्याकुल होकर गिरता है और सिर धुनता है; फिर उठकर हनुमान को ऐसा मारता है कि वे चक्कर खाकर गिर पड़ते हैं। वह नल-नील को पछाड़ता है और योद्धाओं को जहाँ-तहाँ पटकता है। वानर सेना डरकर भाग खड़ी होती है, कोई सामने नहीं ठहरता। अंगद आदि को सुग्रीव समेत मूर्च्छित करके वह वानरराज को काँख में दबाकर चल देता है।

65.1

बन्धु बचन सुनि फिरा बिभीषन । आयउ जहँ त्रैलोक-विभूषन ॥
नाथ भूधराकार-सरीरा । कुम्भकरन आवत रनधीरा ॥

bandhu bacana suni phirā bibhīṣana | āyau jaham̐ trailoka-vibhūṣana ||
nātha bhūdharākāra-sarīrā | kumbhakarana āvata ranadhīrā ||

65.2

एतना कपिन्ह सुना जब काना । किलकिलाइ धाये बलवाना ॥
लिये उपारि बिटप अरु भूधर । कटकटाइ डारहिँ ता अपर ॥

etanā kapinha sunā jaba kānā | kilakilāi dhāye balavānā ||
liye upāri biṭapa aru bhūdhara | kaṭakaṭāi ḍārahim̐ tā apara ||

65.3

कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा । कहिँ भालु कपि एकहि बारा ॥
मुर्यो न मन तनु टर्यो न टार्यो । जिमि गज अर्क-फलनि के मारे ॥

koṭi koṭi giri sikhara prahārā | kahim̐ bhālu kapi ekahi bārā ||
muryo na mana tanu ṭaryo na ṭāryo | jimi gaja arka-phalani ke māre ||

65.4

तब मारुतसुत मुठिका हन्यो । पर्यो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो ॥
पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमन्ता । घुर्मित भूतल परेउ तुरन्ता ॥

taba mārutasuta muṭhikā hanyo | paryo dharani byākula sira dhunyo ||
puni uṭhi tehiṃ māreu hanumantā | ghurmita bhūtala pareu turantā ||

65.5

पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि । जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि ॥
चली बलीमुख-सेन पराई । अति भय त्रसित न कोउ समुहाई ॥

puni nala nīlahi avani pachāresi | jaham̐ taham̐ paṭaki paṭaki bhaṭa ḍāresi ||
calī balīmukha-sena parāī | ati bhaya trasita na kou samuhāī ||

दो॰ 65दोहा

दो अङ्गदादि कपि मुरछित करि समेत सुग्रीव ।
काँख दावि कपिराज कहूँ, चला अमित-बल सी ॥

do aṅgadādi kapi murachita kari sameta sugrīva |
kām̐kha dāvi kapirāja kahūm̐, calā amita-bala sī ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0