लंकाकाण्ड

अध्याय 57: हनुमान के मार्ग में कालनेमि का कपट आश्रम

5 श्लोक · 57 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

हनुमान के मार्ग में कालनेमि का कपट आश्रम

कालनेमि मार्ग में माया से सरोवर, मन्दिर और सुन्दर बाग रच देता है। हनुमान वहाँ जल पीने रुकते हैं। वहाँ राक्षस कपट मुनिवेश में बैठा है। हनुमान जाकर सिर नवाते हैं, और वह राम के गुणों की कथा कहने लगता है: रावण और राम में महायुद्ध हो रहा है, राम जीतेंगे, इसमें संशय नहीं। मैं यहीं बैठे ज्ञानदृष्टि से सब देखता हूँ। कमण्डल देने पर हनुमान कहते हैं कि थोड़े जल से तृप्ति नहीं होगी। वह कहता है: सरोवर में स्नान करके जल्दी आओ, मैं दीक्षा दूँगा जिससे ज्ञान पाओगे। सरोवर में उतरते ही एक मकरी हनुमान का पैर पकड़ लेती है; वे उसे मार देते हैं, और वह दिव्य शरीर धरकर आकाश में चली जाती है।

57.1

अस कहि चला रचिसि मग माया । सर मन्दिर बर बाग बनाया ॥
मारुत-सुत देखा सुभ आश्रम । मुनिहिं बूझि जल पियौं जाइ श्रम ॥

asa kahi calā racisi maga māyā | sara mandira bara bāga banāyā ||
māruta-suta dekhā subha āśrama | munihiṃ būjhi jala piyauṃ jāi śrama ||

57.2

राच्छस कपट बेष तहँ सोहा । मायापति-दूतहि चह मोहा ॥
जाइ पवन-सुत नायउ माथा । लाग सो कहइ राम-गुन-गाथा ॥

rācchasa kapaṭa beṣa taham̐ sohā | māyāpati-dūtahi caha mohā ||
jāi pavana-suta nāyau māthā | lāga so kahai rāma-guna-gāthā ||

57.3

होत महा रन रावन रामहिँ । जितहहिं राम न संसय या महिँ ॥
इहाँ आये में देखउँ भाई । ज्ञान-दृष्टि-बल मोहि अधिकाई ॥

hota mahā rana rāvana rāmahim̐ | jitahahiṃ rāma na saṃsaya yā mahim̐ ||
ihām̐ āye meṃ dekhaum̐ bhāī | jñāna-dṛṣṭi-bala mohi adhikāī ||

57.4

माँगा जल तेहिं दीन्ह कमंडल । कह कपि नहिँ अघाउँ थोरें जल ॥
सर मज्जन करि आतुर आवहु । दिच्छा देउँ ज्ञान जेहिं पावहु ॥

mām̐gā jala tehiṃ dīnha kamaṃḍala | kaha kapi nahim̐ aghāum̐ thoreṃ jala ||
sara majjana kari ātura āvahu | dicchā deum̐ jñāna jehiṃ pāvahu ||

दो॰ 57दोहा

सर पैठत कपि-पद-गहा, मकरीं तब अकुलान ।
मारी सो धरि दिव्य-तनु, चली गगन चढ़ि जान ॥

sara paiṭhata kapi-pada-gahā, makarīṃ taba akulāna |
mārī so dhari divya-tanu, calī gagana car̤hi jāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0