लंकाकाण्ड

अध्याय 56: रावण हनुमान को रोकने कालनेमि के पास

5 श्लोक · 56 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

रावण हनुमान को रोकने कालनेमि के पास

पवनपुत्र चल पड़ते हैं। उधर एक दूत रावण को यह भेद बताता है, और रावण कालनेमि के घर जाता है। दशमुख की बात सुनकर कालनेमि बार-बार सिर धुनता है। जिसने तुम्हारे देखते नगर जला दिया, उसका रास्ता कौन रोक सकता है? हे नाथ, रघुपति को भजकर अपना भला करो, झूठी बकवास छोड़ दो। मैं, तू और मेरा की मूढ़ता छोड़ो, महामोह की रात में सोते हुए जागो। जो कालरूपी सर्प का भी भक्षक है, उसे क्या कोई सपने में भी रण में जीत सकता है? सुनकर रावण अत्यन्त क्रोधित होता है, और कालनेमि मन में विचारता है कि इस पापी के हाथ से मरने से राम के दूत के हाथ मरना अच्छा।

56.1

राम-चरन-सरसिज उर राखी । चला प्रभंजन-सुत बल भाखी ॥
उहाँ दूत एक मरम जनावा । रावन कालनेमि गृह आवा ॥

rāma-carana-sarasija ura rākhī | calā prabhaṃjana-suta bala bhākhī ||
uhām̐ dūta eka marama janāvā | rāvana kālanemi gṛha āvā ||

56.2

दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना । पुनि पुनि कालनेमि सिर धुना ॥
देखत तुम्हहि नगर जेहिं जारा । तासु पन्थ को रोकन पारा ॥

dasamukha kahā maramu tehiṃ sunā | puni puni kālanemi sira dhunā ||
dekhata tumhahi nagara jehiṃ jārā | tāsu pantha ko rokana pārā ||

56.3

भजि रघुपति करु हित आपना । छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना ॥
नील-कञ्ज-तनु सुन्दर स्यामा । हृदयँ राखु लोचनाभिरामा ॥

bhaji raghupati karu hita āpanā | chām̐r̤ahu nātha mṛṣā jalpanā ||
nīla-kañja-tanu sundara syāmā | hṛdayam̐ rākhu locanābhirāmā ||

56.4

मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू । महा मोह निसि सूतत जागू ॥
काल-ब्याल कर भच्छक जोई । सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई ॥

maiṃ taiṃ mora mūr̤hatā tyāgū | mahā moha nisi sūtata jāgū ||
kāla-byāla kara bhacchaka joī | sapanehum̐ samara ki jītia soī ||

दो॰ 56दोहा

सुनि दसकंठ रिसान अति, तेहिं मन कीन्ह बिचार ।
राम दूत कर मरौं बरु, यह खल रत-पल-भार ॥

suni dasakaṃṭha risāna ati, tehiṃ mana kīnha bicāra |
rāma dūta kara marauṃ baru, yaha khala rata-pala-bhāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0