लंकाकाण्ड

अध्याय 32: अंगद ने धरती पर हाथ पटके, मुकुट उड़े

7 श्लोक · 32 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

अंगद ने धरती पर हाथ पटके, मुकुट उड़े

जब रावण ने राम की निन्दा की, अंगद अत्यन्त क्रुद्ध हुए; हरि-हर की निन्दा सुनना गोवध के समान पाप है। दाँत कटकटाकर उन्होंने दोनों भुजाएँ धरती पर मारीं। धरती डोली, सभासद गिरकर भागे। रावण सँभलकर उठा, पर उसके मुकुट गिर पड़े। कुछ उसने सिरों पर रखे, कुछ अंगद ने प्रभु की ओर फेंक दिए। वानर उन्हें उल्का या वज्र समझकर भागे। प्रभु हँसकर कहते हैं: डरो मत, ये न उल्का हैं, न राहु-केतु; ये रावण के मुकुट हैं, बालिपुत्र ने फेंके हैं। हनुमान उन्हें पकड़कर प्रभु के पास रख देते हैं, वे सूर्य जैसे चमकते हैं। उधर रावण चिल्लाता है: बन्दर को पकड़कर मार डालो। अंगद मुस्कराते हैं।

32.1

जब तेहिं कीन्ह राम कइ निन्दा । क्रोधवन्त अति भयउ कपिन्दा ॥
हरि-हर निन्दा सुनइ जो काना । होइ पाप गो-घात-समाना ॥

jaba tehiṃ kīnha rāma kai nindā | krodhavanta ati bhayau kapindā ||
hari-hara nindā sunai jo kānā | hoi pāpa go-ghāta-samānā ||

32.2

कटकटान कपिकुंजर भारी । दुहुँ-सुज-दंड तमकि महि मारी ॥
डोलत धरनि सभासद खसे । चले भागि भय पालत ग्रसे ॥

kaṭakaṭāna kapikuṃjara bhārī | duhum̐-suja-daṃḍa tamaki mahi mārī ||
ḍolata dharani sabhāsada khase | cale bhāgi bhaya pālata grase ||

32.3

गिरत सँभारि उठा दसकन्धर । भूतल परे मुकुट अति सुन्दर ॥
कछु तेहिं लै निज सिरन्हि संवारे । कछु अङ्गद प्रभु पास पबारे ॥

girata sam̐bhāri uṭhā dasakandhara | bhūtala pare mukuṭa ati sundara ||
kachu tehiṃ lai nija siranhi saṃvāre | kachu aṅgada prabhu pāsa pabāre ||

32.4

आवत मुकुट देखि कपि भागे । दिनहीं लूक परन बिधि लागे ॥
की रावन करि कोप चलाये । कुलिस चारि आवत अति धाये ॥

āvata mukuṭa dekhi kapi bhāge | dinahīṃ lūka parana bidhi lāge ||
kī rāvana kari kopa calāye | kulisa cāri āvata ati dhāye ||

32.5

कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू । लूक न असनि केतु नहिँ राहू ॥
ए किरीट दसकन्धर केरे । आवत बालि-तनय के प्रेरे ॥

kaha prabhu ham̐si jani hṛdayam̐ ḍerāhū | lūka na asani ketu nahim̐ rāhū ||
e kirīṭa dasakandhara kere | āvata bāli-tanaya ke prere ||

दो॰ 32 (क)दोहा

तकि पवन सुत कर गहे, आनि धरे प्रभु पास ।
कौतुक देखहिँ भालु कपि, दिनकर-सरिस प्रकास ॥

taki pavana suta kara gahe, āni dhare prabhu pāsa |
kautuka dekhahim̐ bhālu kapi, dinakara-sarisa prakāsa ||

दो॰ 32 (ख)दोहा

उहाँ सकोप दसानन, सब सन कहत रिसाइ ।
धरहु कपिहि धरि मारहु, सुनि अङ्गद मुसुकाइ ॥

uhām̐ sakopa dasānana, saba sana kahata risāi |
dharahu kapihi dhari mārahu, suni aṅgada musukāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0