लंकाकाण्ड

अध्याय 31: चौदह प्राणी जो जीते हुए भी मृत हैं

6 श्लोक · 31 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

चौदह प्राणी जो जीते हुए भी मृत हैं

अंगद कहते हैं: ऐसा करूँ तो भी बड़ाई नहीं, मरे को मारने में पुरुषार्थ नहीं। चौदह प्राणियों का जीवन शव के समान है: वाममार्गी, कामी, कंजूस, अत्यन्त मूढ़, अत्यन्त दरिद्र, बदनाम, बहुत बूढ़ा, सदा रोगी, निरन्तर क्रोधी, विष्णु से विमुख, वेद और संतों का विरोधी, केवल शरीर पोसने वाला, निन्दक और पाप की खान। इसलिए तुझे नहीं मारता। रावण होंठ चबाता कहता है: छोटे मुँह बड़ी बात! तेरे स्वामी में न बल है, न बुद्धि। गुणहीन जानकर पिता ने उसे वनवास दिया; वह दुख, स्त्री का विरह और रात-दिन मेरा डर। ऐसे मनुष्यों को राक्षस रोज खाते हैं।

31.1

जी अस करउँ तदपि न बड़ाई । मुएहि बधें नहिँ कछु मनुसाई ॥
कौल कामबस-कृपिन बिमूढा । अति-दरिद्र अजसी अति-बूढा ॥

jī asa karaum̐ tadapi na bar̤āī | muehi badheṃ nahim̐ kachu manusāī ||
kaula kāmabasa-kṛpina bimūḍhā | ati-daridra ajasī ati-būḍhā ||

31.2

सदा-रोगबस सन्तत क्रोधी । बिष्नु-बिमुख श्रुति-सन्त-बिरोधी ॥
तनु-पोषक निन्दक अघ-खानी । जीवन सव-सम चौदह प्रानी ॥

sadā-rogabasa santata krodhī | biṣnu-bimukha śruti-santa-birodhī ||
tanu-poṣaka nindaka agha-khānī | jīvana sava-sama caudaha prānī ||

31.3

अस बिचारि खल बधउँ न तोही । अब जनि रिस उपजावसि मोही ॥
सुनि सकोप कह निसिचर-नाथा । अधर-दसन-दसि मीजत-हाथा ॥

asa bicāri khala badhaum̐ na tohī | aba jani risa upajāvasi mohī ||
suni sakopa kaha nisicara-nāthā | adhara-dasana-dasi mījata-hāthā ||

31.4

रे कपि अधम भरन अब चहसी । छोटे बदन बात बड़ि कहसी ॥
कटु-जल्पसि जड़-कपि बल-जाकें । बल प्रताप-बुधि-तेज न ताकें ॥

re kapi adhama bharana aba cahasī | choṭe badana bāta bar̤i kahasī ||
kaṭu-jalpasi jar̤a-kapi bala-jākeṃ | bala pratāpa-budhi-teja na tākeṃ ||

दो॰ 31 (क)दोहा

अगुन अमान जानि तेहि, दीन्ह पिता बनबास ।
सो दुख अरु जुबती बिरह, पुनि निसि दिन मम त्रास ॥

aguna amāna jāni tehi, dīnha pitā banabāsa |
so dukha aru jubatī biraha, puni nisi dina mama trāsa ||

दो॰ 31 (ख)दोहा

जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि, अइसे मनुज अनेक ।
खाहिँ निसाचर दिवस-निसि, मूढ़ समुझु तजि टेक ॥

jinha ke bala kara garba tohi, aise manuja aneka |
khāhim̐ nisācara divasa-nisi, mūr̤ha samujhu taji ṭeka ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0