लंकाकाण्ड

अध्याय 30: केवल राम के वचन से अंगद रुके हैं

5 श्लोक · 30 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

केवल राम के वचन से अंगद रुके हैं

अंगद कहते हैं: अरे दुष्ट, अब बात न बढ़ा, अभिमान छोड़। रघुवीर ने सोच-विचारकर मुझे भेजा है; कृपालु बार-बार कहते हैं कि सियार को मारने से सिंह का यश नहीं होता। प्रभु के वचन मन में रखकर मैंने तेरे कठोर वचन सहे, नहीं तो तेरा मुँह तोड़कर सीता को बलपूर्वक ले जाता। हे देवशत्रु, तेरा बल मैं जान गया, तू सूने में पराई स्त्री हर लाता है। तू घमंडी राक्षसराज है, मैं तो रघुपति के सेवक का दूत हूँ। यदि राम के अपमान का डर न होता तो तेरे देखते तुझे धरती पर पटककर, सेना मारकर, नगर चौपट करके, तेरी युवतियों सहित जनकसुता को ले जाता।

30.1

अब जनि बतबढ़ाव खल करही । सुनु मम बचन मान परिहरही ॥
दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ । अस बिचारि रघुबीर पठायउँ ॥

aba jani batabar̤hāva khala karahī | sunu mama bacana māna pariharahī ||
dasamukha maiṃ na basīṭhīṃ āyaum̐ | asa bicāri raghubīra paṭhāyaum̐ ||

30.2

बार बार अस कहइ कृपाला । नहिँ गजारि जस बधें सृकाला ॥
मन महँ समुझि बचन प्रभु केरे । सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे ॥

bāra bāra asa kahai kṛpālā | nahim̐ gajāri jasa badheṃ sṛkālā ||
mana maham̐ samujhi bacana prabhu kere | saheum̐ kaṭhora bacana saṭha tere ||

30.3

नाहिँ त करि मुख-भजन तोरा । लेइ जातेउँ सीतहि बरजोरा ॥
जानेउँ तव बल अधम सुरारी । सूनें हरि आनिहि परनारी ॥

nāhim̐ ta kari mukha-bhajana torā | lei jāteum̐ sītahi barajorā ||
jāneum̐ tava bala adhama surārī | sūneṃ hari ānihi paranārī ||

30.4

हैं निसिचर-पति गर्ब बहूता । मैं रघुपति-सेवक-कर-दूता ॥
जौँ न राम अपमानहिं डरउँ । तोहि देखत अस कौतुक करऊँ ॥

haiṃ nisicara-pati garba bahūtā | maiṃ raghupati-sevaka-kara-dūtā ||
jaum̐ na rāma apamānahiṃ ḍaraum̐ | tohi dekhata asa kautuka karaūm̐ ||

दो॰ 30दोहा

तोहि-पटकि-महि सेन-हति, चौपट करि तव गाउँ ।
तव जुबतिन्ह समेत सठ, जनकसुतहि लेइ जाउँ ॥

tohi-paṭaki-mahi sena-hati, caupaṭa kari tava gāum̐ |
tava jubatinha sameta saṭha, janakasutahi lei jāum̐ ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0