लंकाकाण्ड

अध्याय 29: ब्रह्मा का लेख और अंगद का उत्तर

6 श्लोक · 29 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

ब्रह्मा का लेख और अंगद का उत्तर

रावण कहता है: जब मेरे सिर जल रहे थे, मैंने ललाट पर ब्रह्मा का लेख पढ़ा कि मनुष्य के हाथ से मेरी मृत्यु होगी। उसे झूठा जानकर मैं हँसा; बूढ़े ब्रह्मा ने भोली बुद्धि से लिख दिया। और तू लाज छोड़कर मेरे आगे दूसरे का बल कहता है। अंगद कहते हैं: रावण, तुम्हारे समान लज्जाशील कोई नहीं, तुम अपने मुँह से अपने गुण कभी नहीं कहते। इसीलिए सिर और पर्वत की कथा बीस बार कह चुके, और जिस भुजबल से सहस्रबाहु, बलि और बालि को जीता, उसे छिपा रखा! क्या सिर काटने से कोई शूर होता है? बाजीगर अपना सारा शरीर काटता है, उसे कोई वीर नहीं कहता। पतंगे जलते हैं और गधे बोझ ढोते हैं, वे शूर नहीं कहलाते।

29.1

जरत बिलोकेउँ जबहिँ कपाला । विधि के लिखे अङ्क निज भाला ॥
नर कें कर आपन बध बाँची । हसेउँ जानि विधि गिरा असाँची ॥

jarata bilokeum̐ jabahim̐ kapālā | vidhi ke likhe aṅka nija bhālā ||
nara keṃ kara āpana badha bām̐cī | haseum̐ jāni vidhi girā asām̐cī ||

29.2

सोउ मन समुझि त्रास नहिँ मोरें । लिखा बिरञ्चि जरठ-मति-भोरें ॥
आन बीर बल सठ मम आगें । पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागे ॥

sou mana samujhi trāsa nahim̐ moreṃ | likhā birañci jaraṭha-mati-bhoreṃ ||
āna bīra bala saṭha mama āgeṃ | puni puni kahasi lāja pati tyāge ||

29.3

कह अङ्गद सलज्ज जग माहीं । रावन तोहि समान कोउ नाहीँ ॥
लाजवन्त तव सहज सुभाऊ । निज-मुख निज गुन कहसि न काऊ ॥

kaha aṅgada salajja jaga māhīṃ | rāvana tohi samāna kou nāhīm̐ ||
lājavanta tava sahaja subhāū | nija-mukha nija guna kahasi na kāū ||

29.4

सिर अरु सैल कथा चित रही । ता तें बार बीस तैं कही ॥
सो भुजबल राखेउ उर घाली । जीतेहु सहसबाहु-बलि-बाली ॥

sira aru saila kathā cita rahī | tā teṃ bāra bīsa taiṃ kahī ||
so bhujabala rākheu ura ghālī | jītehu sahasabāhu-bali-bālī ||

29.5

सुनु मति-मन्दु-देहि अब पूरा । काटें सीस कि होइअ सूरा ॥
इन्द्रजालि कह कहिअ न बीरा । काटइ निज कर सकल सरीरा ॥

sunu mati-mandu-dehi aba pūrā | kāṭeṃ sīsa ki hoia sūrā ||
indrajāli kaha kahia na bīrā | kāṭai nija kara sakala sarīrā ||

दो॰ 29दोहा

जरहिँ पतङ्ग मोह बस, भार बहहिं खर-बृन्द ।
ते नहिँ सूर कहावहिं, समुझि देखु मति-मन्द ॥

jarahim̐ pataṅga moha basa, bhāra bahahiṃ khara-bṛnda |
te nahim̐ sūra kahāvahiṃ, samujhi dekhu mati-manda ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0