लंकाकाण्ड

अध्याय 20: अंगद का पहला सन्देश: शरण लो और बचो

5 श्लोक · 20 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

अंगद का पहला सन्देश: शरण लो और बचो

रावण पूछता है: रे बन्दर, तू कौन है? अंगद कहते हैं: मैं रघुवीर का दूत हूँ। मेरे पिता से तुम्हारी मित्रता थी, इसलिए तुम्हारे हित के लिए आया हूँ। तुम पुलस्त्य के पौत्र हो, तुमने शिव और ब्रह्मा की पूजा करके वर पाए, लोकपालों और सब राजाओं को जीता। पर मद और मोह के वश तुम जगदम्बा सीता को हर लाए। अब मेरी बात सुनो, प्रभु सब अपराध क्षमा कर देंगे। दाँतों में तिनका दबाकर, गले में कुल्हाड़ी डालकर, परिवार सहित, जनकसुता को आदर से आगे करके, भय छोड़कर चलो। कहना: हे शरणागतपालक रघुकुलमणि, मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। यह आर्त वाणी सुनते ही प्रभु तुम्हें अभय कर देंगे।

20.1

कह दसकंठ कवन तैं बन्दर । मैं रघुबीर दूत दसकन्धर ॥
मम जनकहि तोहि रही मिताई । तव हित कारन आयउँ भाई ॥

kaha dasakaṃṭha kavana taiṃ bandara | maiṃ raghubīra dūta dasakandhara ||
mama janakahi tohi rahī mitāī | tava hita kārana āyaum̐ bhāī ||

20.2

उत्तम-कुल पुलस्ति कर नाती । सिव बिरञ्चि पूजेहु बहु भाँती ॥
बर पायहु कीन्हेहु सब काजा । जीतेहु लोकपाल सब राजा ॥

uttama-kula pulasti kara nātī | siva birañci pūjehu bahu bhām̐tī ||
bara pāyahu kīnhehu saba kājā | jītehu lokapāla saba rājā ||

20.3

नृप अभिमान मोह बस किंबा । हरि आनिहु सीता जगदम्बा ॥
अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा । सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा ॥

nṛpa abhimāna moha basa kiṃbā | hari ānihu sītā jagadambā ||
aba subha kahā sunahu tumha morā | saba aparādha chamihi prabhu torā ||

20.4

दसन गहहु तन कंठ कुठारी । परिजन सहित सङ्ग निज नारी ॥
सादर जनक-सुता करि आगें । एहि विधि चलहु सकल भय त्यागें ॥

dasana gahahu tana kaṃṭha kuṭhārī | parijana sahita saṅga nija nārī ||
sādara janaka-sutā kari āgeṃ | ehi vidhi calahu sakala bhaya tyāgeṃ ||

दो॰ 20दोहा

प्रनतपाल रघुबंस-मनि, त्राहि त्राहि अब मोहि ।
आरत गिरा सुनत प्रभु, अभय करैगो तोहि ॥

pranatapāla raghubaṃsa-mani, trāhi trāhi aba mohi |
ārata girā sunata prabhu, abhaya karaigo tohi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0