लंकाकाण्ड

अध्याय 16: रावण मंदोदरी का उपहास करता है

6 श्लोक · 16 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

रावण मंदोदरी का उपहास करता है

पत्नी के वचन सुनकर रावण हँसता है: अहो, मोह की महिमा बड़ी बलवान है! वह कहता है कि कवि सच कहते हैं, स्त्री के स्वभाव में आठ अवगुण सदा रहते हैं: साहस, झूठ, चंचलता, छल, भय, अविवेक, अपवित्रता और निर्दयता। तूने शत्रु का जो विशाल रूप सुनाया, वह सब तो मेरे वश में है। मैं तेरी चतुराई जान गया, इसी बहाने तू मेरी प्रभुता कह रही है। मंदोदरी मन में ठान लेती है कि काल के वश पति की बुद्धि भ्रमित हो गई है। सबेरा होते ही सहज निडर, मद में अंधा लंकापति सभा में जाता है। सोरठा कहता है: बादल अमृत बरसाएँ तो भी बेंत न फूलता न फलता, मूर्ख के हृदय में चेत नहीं आता चाहे ब्रह्मा और शिव गुरु मिलें।

16.1

बिहँसा नारि बचन सुनि काना । अहो मोह-महिमा बलवाना ॥
नारि सुभाव सत्य कवि कहहीं । अवगुन आठ सदा उर रहहीं ॥

biham̐sā nāri bacana suni kānā | aho moha-mahimā balavānā ||
nāri subhāva satya kavi kahahīṃ | avaguna āṭha sadā ura rahahīṃ ||

16.2

साहस अनृत चपलता माया । भय अबिबेक असौच अदाया ॥
रिपु कर रूप सकल तैं गावा । अति बिसाल जय मोहि सुनावा ॥

sāhasa anṛta capalatā māyā | bhaya abibeka asauca adāyā ||
ripu kara rūpa sakala taiṃ gāvā | ati bisāla jaya mohi sunāvā ||

16.3

सो सब प्रिया सहज बस मोरें । समुझि परा प्रसाद अब तोरें ॥
जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई । एहि मिस कहहु मोरि प्रभुताई ॥

so saba priyā sahaja basa moreṃ | samujhi parā prasāda aba toreṃ ||
jānium̐ priyā tori caturāī | ehi misa kahahu mori prabhutāī ||

16.4

तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि । समुझत-सुखद सुनत-भय मोचनि ॥
मन्दोदरि मन महुँ अस ठयऊ । पियहि काल-बस मति-मम भयऊ ॥

tava batakahī gūr̤ha mṛgalocani | samujhata-sukhada sunata-bhaya mocani ||
mandodari mana mahum̐ asa ṭhayaū | piyahi kāla-basa mati-mama bhayaū ||

दो॰ 16 (क)दोहा

एहि बिधि करत बिनोद बहु, प्रात प्रगट दसकन्ध ।
सहज असङ्क लंकपति, सभाँ गयउ मद-अन्ध ॥

ehi bidhi karata binoda bahu, prāta pragaṭa dasakandha |
sahaja asaṅka laṃkapati, sabhām̐ gayau mada-andha ||

16.सो॰ 16 (ख)सोरठा

फूलह फरइ न बेत, जदपि सुधा बरषहिँ, जलद ।
मूरुख हृदयँ न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरञ्चि-सिब ॥

phūlaha pharai na beta, jadapi sudhā baraṣahim̐, jalada |
mūrukha hṛdayam̐ na ceta, jo guru milahiṃ birañci-siba ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0