परा बिकल महि सर के लागें । पुनि उठि बैठि देखि प्रभु आगें ॥
स्याम गात सिर जटा बनाये । अरुन नयन सर चाप चढ़ाये ॥
parā bikala mahi sara ke lāgeṃ | puni uṭhi baiṭhi dekhi prabhu āgeṃ ||
syāma gāta sira jaṭā banāye | aruna nayana sara cāpa car̤hāye ||
6 श्लोक · 9 में से 30
बालि गिरता है, फिर उठ बैठता है और प्रभु को देखता है: साँवला शरीर, सिर पर जटा, लाल नेत्र, धनुष पर बाण। वह चरणों में चित्त लगाकर जन्म सफल मानता है; हृदय में प्रीति है, पर वचन कठोर हैं: धर्म के लिए अवतार लिया और मुझे व्याध की तरह मारा? मैं बैरी और सुग्रीव प्यारा, मेरा अपराध क्या? श्रीराम उत्तर देते हैं: छोटे भाई की स्त्री, बहन, पुत्रवधू और कन्या, ये चारों समान हैं; इन्हें कुदृष्टि से देखने वाले को मारने में पाप नहीं। अभिमान में तूने स्त्री की सीख न सुनी और मेरी भुजा के आश्रित को मारना चाहा। बालि कहता है, स्वामी के आगे मेरी चतुराई नहीं चलती; अन्तकाल में आपकी शरण पाकर भी क्या मैं पापी हूँ?
परा बिकल महि सर के लागें । पुनि उठि बैठि देखि प्रभु आगें ॥
स्याम गात सिर जटा बनाये । अरुन नयन सर चाप चढ़ाये ॥
parā bikala mahi sara ke lāgeṃ | puni uṭhi baiṭhi dekhi prabhu āgeṃ ||
syāma gāta sira jaṭā banāye | aruna nayana sara cāpa car̤hāye ||
पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा । सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा ॥
हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा । बोला चितइ राम की ओरा ॥
puni puni citai carana cita dīnhā | suphala janma mānā prabhu cīnhā ||
hṛdayam̐ prīti mukha bacana kaṭhorā | bolā citai rāma kī orā ||
धरम हेतु अवतरेहु गोसाई । मारेहु मोहि ब्याध की नाई ॥
मैं बैरी सुग्रीव पियारा । अवगुन कवन नाथ मोहि मारा ॥
dharama hetu avatarehu gosāī | mārehu mohi byādha kī nāī ||
maiṃ bairī sugrīva piyārā | avaguna kavana nātha mohi mārā ||
अनुज-बधू भगिनी सुत-नारी । सुनु सठ कन्या सम ये चारी ॥
इन्हहिँ कुद्दष्टि बिलोकइ जोई । ताहि बधें कछु पाप न होई ॥
anuja-badhū bhaginī suta-nārī | sunu saṭha kanyā sama ye cārī ||
inhahim̐ kuddaṣṭi bilokai joī | tāhi badheṃ kachu pāpa na hoī ||
मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना । नारि सिखावन करसि न काना ॥
मम भुज बल आश्रित तेहि जानी । मारा चहसि अधम अभिमानी ॥
mūr̤ha tohi atisaya abhimānā | nāri sikhāvana karasi na kānā ||
mama bhuja bala āśrita tehi jānī | mārā cahasi adhama abhimānī ||
सुनहु राम स्वामी सन, चल न चातुरी मोरि ।
प्रभु अजहूँ मैं पापी, अन्तकाल गति तोरि ॥
sunahu rāma svāmī sana, cala na cāturī mori |
prabhu ajahūm̐ maiṃ pāpī, antakāla gati tori ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0