अस कहि चला महा अभिमानी । तृन समान सुग्रीवहि जानी ॥
भिरे उभौ बाली अति तर्जा । मुठिका मारि महाधुनि गर्जा ॥
asa kahi calā mahā abhimānī | tṛna samāna sugrīvahi jānī ||
bhire ubhau bālī ati tarjā | muṭhikā māri mahādhuni garjā ||
5 श्लोक · 8 में से 30
अभिमानी बालि सुग्रीव को तिनके के समान समझकर निकलता है। उसका घूँसा वज्र-सा लगता है और सुग्रीव भागकर श्रीराम से कहते हैं, मैंने कहा था, यह भाई नहीं, मेरा काल है। प्रभु समझाते हैं कि तुम दोनों भाई एक-से दिखते हो, इसी भ्रम से बाण नहीं चलाया। उनके छूते ही सुग्रीव का शरीर वज्र-सा हो जाता है और पीड़ा मिट जाती है। पहचान के लिए गले में फूलों की माला डालकर, बल देकर फिर भेजते हैं। फिर लड़ाई होती है और रघुराई वृक्ष की ओट से देखते हैं। जब सुग्रीव बहुत छल-बल करके भी भय से हार मान लेते हैं, तब श्रीराम बाण तानकर बालि के हृदय के बीच मारते हैं।
अस कहि चला महा अभिमानी । तृन समान सुग्रीवहि जानी ॥
भिरे उभौ बाली अति तर्जा । मुठिका मारि महाधुनि गर्जा ॥
asa kahi calā mahā abhimānī | tṛna samāna sugrīvahi jānī ||
bhire ubhau bālī ati tarjā | muṭhikā māri mahādhuni garjā ||
तब सुग्रीव बिकल होइ भागा । मुष्टि-प्रहार बज्र सम लागा ॥
मैं जो कहा रघुबीर कृपाला । बन्धु न होइ मोर यह काला ॥
taba sugrīva bikala hoi bhāgā | muṣṭi-prahāra bajra sama lāgā ||
maiṃ jo kahā raghubīra kṛpālā | bandhu na hoi mora yaha kālā ||
एक रूप तुम्ह भ्राता दोऊ । तेहि भ्रम तँ नहिँ मारेउँ सोऊ ॥
कर परसा सुग्रीव सरीरा । तनु भा कुलिस गई सब पीरा ॥
eka rūpa tumha bhrātā doū | tehi bhrama tam̐ nahim̐ māreum̐ soū ||
kara parasā sugrīva sarīrā | tanu bhā kulisa gaī saba pīrā ||
मेली कंठ सुमन कै माला । पठवा पुनि बल देइ विसाला ॥
पुनि नाना बिधि भई लराई । बिटप ओट देखहिँ रघुराई ॥
melī kaṃṭha sumana kai mālā | paṭhavā puni bala dei visālā ||
puni nānā bidhi bhaī larāī | biṭapa oṭa dekhahim̐ raghurāī ||
बहु छल बल सुग्रीव करि, हियँ हारा भय मानि ।
मारा बाली राम तब, हृदय माँझ सर तानि ॥
bahu chala bala sugrīva kari, hiyam̐ hārā bhaya māni |
mārā bālī rāma taba, hṛdaya mām̐jha sara tāni ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0