जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें । सेवक प्रभुहि परइ जनि मारे ॥
नाथ जीव तव मायाँ मोहा । सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा ॥
jadapi nātha bahu avaguna moreṃ | sevaka prabhuhi parai jani māre ||
nātha jīva tava māyām̐ mohā | so nistarai tumhārehiṃ chohā ||
5 श्लोक · 3 में से 30
हनुमान विनती करते जाते हैं। नाथ, मुझमें बहुत अवगुण हैं, पर सेवक स्वामी के मन से न उतरे। आपकी माया से मोहित जीव आपकी कृपा से ही पार होता है। मैं भजन का कोई साधन नहीं जानता; सेवक स्वामी के भरोसे वैसे ही निश्चिन्त रहता है जैसे बालक माता के भरोसे। वे चरणों में गिरकर अपना रूप प्रकट करते हैं। श्रीराम उन्हें उठाकर छाती से लगाते हैं और अपने आँसुओं से सींचते हैं। हे कपि, मन छोटा न करो, तुम मुझे लक्ष्मण से भी दूने प्रिय हो। मैं समदर्शी कहलाता हूँ, फिर भी जिस सेवक को मेरे सिवा कोई गति नहीं, वह मुझे प्रिय है। दोहा बताता है कि अनन्य वही है जिसकी यह बुद्धि नहीं डिगती कि मैं सेवक हूँ और सारा चराचर मेरे स्वामी भगवान का रूप है।
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें । सेवक प्रभुहि परइ जनि मारे ॥
नाथ जीव तव मायाँ मोहा । सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा ॥
jadapi nātha bahu avaguna moreṃ | sevaka prabhuhi parai jani māre ||
nātha jīva tava māyām̐ mohā | so nistarai tumhārehiṃ chohā ||
ता पर मैं रघुबीर दोहाई । जानउँ नहिँ कछु भजन उपाई ॥
सेवक सुत पति मातु भरोसें । रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें ॥
tā para maiṃ raghubīra dohāī | jānaum̐ nahim̐ kachu bhajana upāī ||
sevaka suta pati mātu bharoseṃ | rahai asoca banai prabhu poseṃ ||
अस कहि परेउ, चरन अकुलाई । निज-तनु प्रगटि प्रीति उर छाई ॥
तब रघुपति उठाइ उर लावा । निज-लोचन-जल सींचि जुड़ावा ॥
asa kahi pareu, carana akulāī | nija-tanu pragaṭi prīti ura chāī ||
taba raghupati uṭhāi ura lāvā | nija-locana-jala sīṃci jur̤āvā ||
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना । तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना ॥
समदरसी मोहि कह सब कोऊ । सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ ॥
sunu kapi jiyam̐ mānasi jani ūnā | taiṃ mama priya lachimana te dūnā ||
samadarasī mohi kaha saba koū | sevaka priya ananyagati soū ||
सो अनन्य जाकें असि, मति न टरइ हनुमन्त ।
मैं सेवक सचराचर, रूप स्वामि भगवन्त ॥
so ananya jākeṃ asi, mati na ṭarai hanumanta |
maiṃ sevaka sacarācara, rūpa svāmi bhagavanta ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0