नाइ चरन सिर कह कर जोरी । नाथ मोहि कछु नाहि न खोरी ॥
अतिसय प्रबल देव तव माया । छूटइ राम करहु जौँ दाया ॥
nāi carana sira kaha kara jorī | nātha mohi kachu nāhi na khorī ||
atisaya prabala deva tava māyā | chūṭai rāma karahu jaum̐ dāyā ||
5 श्लोक · 21 में से 30
श्रीराम के चरणों में सिर नवाकर, हाथ जोड़कर सुग्रीव कहते हैं: नाथ, मेरा कोई दोष नहीं, आपकी माया अत्यन्त प्रबल है, आपकी दया हो तभी छूटती है। देवता, मनुष्य और मुनि विषयों के वश हैं, मैं तो पामर, पशु और अत्यन्त कामी वानर हूँ। जिसे स्त्री के नयन-बाण नहीं लगे, जो क्रोध की अँधेरी रात में जागता रहा, जिसके गले में लोभ का फन्दा नहीं पड़ा, हे रघुराई, वह मनुष्य आपके समान है। यह गुण साधन से नहीं, आपकी कृपा से कोई-कोई ही पाता है। तब रघुपति मुस्कराकर कहते हैं, तुम मुझे भाई भरत के समान प्रिय हो। अब मन लगाकर वही यत्न करो जिससे सीता की सुधि मिले। इतने में सब दिशाओं से अनेक रंगों के वानरों के झुण्ड आ पहुँचते हैं।
नाइ चरन सिर कह कर जोरी । नाथ मोहि कछु नाहि न खोरी ॥
अतिसय प्रबल देव तव माया । छूटइ राम करहु जौँ दाया ॥
nāi carana sira kaha kara jorī | nātha mohi kachu nāhi na khorī ||
atisaya prabala deva tava māyā | chūṭai rāma karahu jaum̐ dāyā ||
विषय-बस्य-सुर-नर मुनि स्वामी । मैं पावँर पसु कपि अति कामी ॥
नारि नयन सर जाहि न लागा । घोर क्रोध तम-निसि जो जागा ॥
viṣaya-basya-sura-nara muni svāmī | maiṃ pāvam̐ra pasu kapi ati kāmī ||
nāri nayana sara jāhi na lāgā | ghora krodha tama-nisi jo jāgā ||
लोभ पास जेहिं गर न बंधाया । सो नर तुम्ह समान रघुराया ॥
यह गुन साधन तें नहिँ होई । तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई ॥
lobha pāsa jehiṃ gara na baṃdhāyā | so nara tumha samāna raghurāyā ||
yaha guna sādhana teṃ nahim̐ hoī | tumharī kṛpām̐ pāva koi koī ||
तब रघुपति बोले मुसकाई । तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई ॥
अब सोइ जतन करहु मन लाई । जेहि बिधि सीता के सुधि पाई ॥
taba raghupati bole musakāī | tumha priya mohi bharata jimi bhāī ||
aba soi jatana karahu mana lāī | jehi bidhi sītā ke sudhi pāī ||
एहि बिधि होत बतकही, आये बानर जूथ ।
नाना बरन सकल दिसि, देखिय कीस वरूथ ॥
ehi bidhi hota batakahī, āye bānara jūtha |
nānā barana sakala disi, dekhiya kīsa varūtha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0