बरषा गत निर्मल रितु आई । सुधि न तात सीता के पाई ॥
एक बार कैसेहुँ सुधि जानउँ । कालहु जीति निमिष महँ आनौं ॥
baraṣā gata nirmala ritu āī | sudhi na tāta sītā ke pāī ||
eka bāra kaisehum̐ sudhi jānaum̐ | kālahu jīti nimiṣa maham̐ ānauṃ ||
5 श्लोक · 18 में से 30
श्रीराम कहते हैं, वर्षा बीत गई और निर्मल ऋतु आ गई, पर सीता की कोई सुधि नहीं मिली। एक बार भी पता चल जाए तो काल को भी जीतकर पल भर में ले आऊँ। सुग्रीव ने भी राज्य, कोष, नगर और स्त्री पाकर मुझे भुला दिया। जिस बाण से बालि को मारा, उसी से उस मूर्ख को कल मारूँगा। शिवजी उमा से कहते हैं, जिनकी कृपा से मद और मोह छूट जाते हैं, क्या उन्हें स्वप्न में भी क्रोध हो सकता है? लक्ष्मण प्रभु को क्रोधित जानकर धनुष चढ़ाते और बाण हाथ में लेते हैं। तब करुणा की सीमा रघुपति छोटे भाई को समझाते हैं: तात, सखा सुग्रीव को भय दिखाकर ले आओ।
बरषा गत निर्मल रितु आई । सुधि न तात सीता के पाई ॥
एक बार कैसेहुँ सुधि जानउँ । कालहु जीति निमिष महँ आनौं ॥
baraṣā gata nirmala ritu āī | sudhi na tāta sītā ke pāī ||
eka bāra kaisehum̐ sudhi jānaum̐ | kālahu jīti nimiṣa maham̐ ānauṃ ||
कतहुँ रहउ जौँ जीवति होई । तात जतन करि आनेउँ सोई ॥
सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी । पावा राज-कोस-पुर-नारी ॥
katahum̐ rahau jaum̐ jīvati hoī | tāta jatana kari āneum̐ soī ||
sugrīvahum̐ sudhi mori bisārī | pāvā rāja-kosa-pura-nārī ||
जेहिं सायक मारा मैं बाली । तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली ॥
जासु कृपाँ छूटहि मद-मोहा । ता कह उमा कि सपनेहुँ कोहा ॥
jehiṃ sāyaka mārā maiṃ bālī | tehiṃ sara hatauṃ mūr̤ha kaham̐ kālī ||
jāsu kṛpām̐ chūṭahi mada-mohā | tā kaha umā ki sapanehum̐ kohā ||
जानहिँ यह चरित्र मुनि ज्ञानी । जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी ॥
लछिमन क्रोधवन्त प्रभु जाना । धनुष चढाइ गहे कर बाना ॥
jānahim̐ yaha caritra muni jñānī | jinha raghubīra carana rati mānī ||
lachimana krodhavanta prabhu jānā | dhanuṣa caḍhāi gahe kara bānā ||
तब अनुजहि समुझावा, रघुपति करुना सीँव ।
भय देखाइ लेइ आवहु, तात सखा सुग्रीव ॥
taba anujahi samujhāvā, raghupati karunā sīm̐va |
bhaya dekhāi lei āvahu, tāta sakhā sugrīva ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0