बालकाण्ड

अध्याय 9: उपहास का स्वागत, काव्यकला का अभाव

7 श्लोक · 9 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

उपहास का स्वागत, काव्यकला का अभाव

तुलसीदास कहते हैं कि दुष्टों का उपहास उनके हित में होगा। कौए कोयल को कठोर कहते हैं, बगुले हंस पर हँसते हैं। जिन्हें काव्य से प्रेम है पर श्रीराम के चरणों से नहीं, उन्हें भाषा की यह भोली रचना हँसी की वस्तु लगेगी, और उनका हँसना दोष नहीं। जिनकी प्रभु में प्रीति नहीं, उन्हें कथा फीकी लगेगी। पर जिनकी हरि और हर के चरणों में प्रीति है और बुद्धि कुतर्क से रहित है, उन्हें रघुबर की कथा मीठी लगेगी, और वे इसे भक्ति से सजी जानकर सराहेंगे। फिर कवि खुलकर कहते हैं कि वे कवि नहीं हैं। अक्षर, अर्थ, अलंकार, छन्द, भाव और रस के भेद तथा काव्य के गुण दोष का उन्हें कोई ज्ञान नहीं। रचना में एक ही जगतप्रसिद्ध गुण है, जिसे बुद्धिमान विचारेंगे।

9.1

खल परिहास होइ हित मोरा । काक कहहिं कलकंठ कठोरा ॥
हंसहि बक दादुर चातकही । हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही ॥

khala parihāsa hoi hita morā | kāka kahahiṃ kalakaṃṭha kaṭhorā ||
haṃsahi baka dādura cātakahī | ham̐sahiṃ malina khala bimala batakahī ||

9.2

कबित रसिक न राम-पद-नेहू । तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू ॥
भाषा भनिति भोरि मति मोरी । हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी ॥

kabita rasika na rāma-pada-nehū | tinha kaham̐ sukhada hāsa rasa ehū ||
bhāṣā bhaniti bhori mati morī | ham̐sibe joga ham̐seṃ nahiṃ khorī ||

9.3

प्रभु-पद-प्रीति न सामुझि नीकी । तिन्हहिं कथा सुनि लागिहि फीकी ॥
हरि-हर-पद-रति मति न कुतरकी । तिन्ह कहँ मधुर कथा रघुबर की ॥

prabhu-pada-prīti na sāmujhi nīkī | tinhahiṃ kathā suni lāgihi phīkī ||
hari-hara-pada-rati mati na kutarakī | tinha kaham̐ madhura kathā raghubara kī ||

9.4

राम भगति-भूषित जियँ जानी । सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी ॥
कबि न होउँ नहिँ चतुर प्रबीनू । सकल कला सब बिद्या-हीनू ॥

rāma bhagati-bhūṣita jiyam̐ jānī | sunihahiṃ sujana sarāhi subānī ||
kabi na houm̐ nahim̐ catura prabīnū | sakala kalā saba bidyā-hīnū ||

9.5

आखर अरथ अलंकृति नाना । छन्द प्रबन्ध अनेक विधाना ॥
भाव-भेद रस-भेद अपारा । कबित दोष-गुन बिबिध प्रकारा ॥

ākhara aratha alaṃkṛti nānā | chanda prabandha aneka vidhānā ||
bhāva-bheda rasa-bheda apārā | kabita doṣa-guna bibidha prakārā ||

9.6

कबित बिबेक एक नहिं मोरें । सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे ॥

kabita bibeka eka nahiṃ moreṃ | satya kahaum̐ likhi kāgada kore ||

दो॰ 9दोहा

भनिति मोरि सब गुन रहित, विस्व विदित गुन एक ।
सो बिचारि सुनिहहिँ सुमति, जिन्ह कें बिमल बिबेक ॥

bhaniti mori saba guna rahita, visva vidita guna eka |
so bicāri sunihahim̐ sumati, jinha keṃ bimala bibeka ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0