बालकाण्ड

अध्याय 8: सबसे कवि की विनम्र याचना

8 श्लोक · 8 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

सबसे कवि की विनम्र याचना

चौरासी लाख योनियों के जल, थल और आकाश में रहने वाले सब जीवों को सीताराममय जानकर तुलसीदास हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं। वे सबसे विनती करते हैं कि उन्हें अपना दास मानकर छल छोड़कर स्नेह करें, क्योंकि उन्हें अपनी बुद्धि के बल पर भरोसा नहीं है। वे रघुपति के गुण गाना चाहते हैं, पर बुद्धि छोटी है और चरित अथाह। रुचि ऊँची है और मति नीची, जैसे कोई अमृत चाहे और उसे छाछ भी न मिले। सज्जन उनकी ढिठाई क्षमा करेंगे और ऐसे सुनेंगे जैसे माता पिता बालक की तोतली बात प्रसन्न होकर सुनते हैं। कुटिल लोग हँसेंगे, जो पराये दोषों को गहना बनाकर पहनते हैं। दोहा सार देता है: भाग्य छोटा है, अभिलाषा बड़ी, पर एक विश्वास है। सज्जन सुनकर सुख पाएँगे, दुष्ट उपहास करेंगे।

8.1

आकर चारि लाख चौरासी । जाति जीव जल-थल-नभ-वासी ॥
सीय-राम-मय सब जग जानी । करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ॥

ākara cāri lākha caurāsī | jāti jīva jala-thala-nabha-vāsī ||
sīya-rāma-maya saba jaga jānī | karaum̐ pranāma jori juga pānī ||

8.2

जानि कृपाकर किङ्कर मोहू । सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू ॥
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीँ । ता तें बिनय करउँ सब पाहीं ॥

jāni kṛpākara kiṅkara mohū | saba mili karahu chār̤i chala chohū ||
nija budhi bala bharosa mohi nāhīm̐ | tā teṃ binaya karaum̐ saba pāhīṃ ||

8.3

करन चहउँ रघुपति-गुन-गाहा । लघु-मति-मोरि चरित अवगाहा ॥
सूझ न एकउ अङ्ग उपाऊ । मन-मति-रङ्क मनोरथ राऊ ॥

karana cahaum̐ raghupati-guna-gāhā | laghu-mati-mori carita avagāhā ||
sūjha na ekau aṅga upāū | mana-mati-raṅka manoratha rāū ||

8.4

मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी । चहिय अमिय जग जुरइ न छाछी ॥
छमिहहिँ सज्जन मोरि ढिठाई । सुनिहहिँ बाल बचन मन लाई ॥

mati ati nīca ūm̐ci ruci āchī | cahiya amiya jaga jurai na chāchī ||
chamihahim̐ sajjana mori ḍhiṭhāī | sunihahim̐ bāla bacana mana lāī ||

8.5

जौं बालक कह तोतरि बाता । सुनहिँ मुदित मन पितु अरु माता ॥
हँसिहहिँ कूर कुटिल कुबिचारी । जे पर-दूषन भूषन-धारी ॥

jauṃ bālaka kaha totari bātā | sunahim̐ mudita mana pitu aru mātā ||
ham̐sihahim̐ kūra kuṭila kubicārī | je para-dūṣana bhūṣana-dhārī ||

8.6

निज कवित केहि लाग न नीका । सरस होउ अथवा अति फीका ॥
जे पर-भनिति सुनत हरषाहीं । ते बर पुरुष बहुत जग नाहीँ ॥

nija kavita kehi lāga na nīkā | sarasa hou athavā ati phīkā ||
je para-bhaniti sunata haraṣāhīṃ | te bara puruṣa bahuta jaga nāhīm̐ ||

8.7

जग बहु नर सर सरि सर सम भाई । जे निज बाढ़ि बढ़हिँ जल पाई ॥
सज्जन सकृत सिन्धु सम कोई । देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई ॥

jaga bahu nara sara sari sara sama bhāī | je nija bār̤hi bar̤hahim̐ jala pāī ||
sajjana sakṛta sindhu sama koī | dekhi pūra bidhu bār̤hai joī ||

दो॰ 8दोहा

भाग छोट अभिलाष बड़, करउँ एक बिस्वास ।
पैहहिं सुख सुनि सुजन जन, खल करिहहिँ उपहास ॥

bhāga choṭa abhilāṣa bar̤a, karaum̐ eka bisvāsa |
paihahiṃ sukha suni sujana jana, khala karihahim̐ upahāsa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0