बालकाण्ड

अध्याय 81: सप्तर्षियों की जगदम्बा को वन्दना

5 श्लोक · 81 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

सप्तर्षियों की जगदम्बा को वन्दना

पार्वती बोलीं, हे मुनीश्वरो, यदि आप पहले मिलते तो मैं आपकी सीख सिर पर रखकर मान लेती। अब मैंने शम्भु के लिए जन्म हार दिया है, अब गुण दोष का विचार कौन करे? करोड़ जन्मों तक मेरा यही हठ रहेगा कि शम्भु से ही विवाह करूँगी, नहीं तो कुँआरी रहूँगी। स्वयं महेश सौ बार कहें, तब भी नारद का उपदेश नहीं छोड़ूँगी। जगदम्बा बोलीं, मैं आपके पाँव पड़ती हूँ, आप घर जाइए, देर हो गई। प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले, हे जगदम्बिके भवानी, आपकी जय हो। आप माया हैं और शिव भगवान हैं, आप दोनों सारे जगत के माता पिता हैं। चरणों में सिर नवाकर मुनि पुलकित होकर चले।

81.1

जौँ तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा । सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा ॥
अब मैं जनम सम्भु हित हारा । को गुन दूषन करै विचारा ॥

jaum̐ tumha milatehu prathama munīsā | sunatium̐ sikha tumhāri dhari sīsā ||
aba maiṃ janama sambhu hita hārā | ko guna dūṣana karai vicārā ||

81.2

जौँ तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी । रहि न जाइ बिनु किये बरेषी ॥
तौ कौतुकिअन्ह आलस नाहीँ । बर-कन्या अनेक जग माहीं ॥

jaum̐ tumhare haṭha hṛdayam̐ biseṣī | rahi na jāi binu kiye bareṣī ||
tau kautukianha ālasa nāhīm̐ | bara-kanyā aneka jaga māhīṃ ||

81.3

जनम कोटि लगि रगर हमारी । बरउँ सम्मु न त रहउँ कुआरी ॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू । आपु कहहिँ सत बार महेसू ॥

janama koṭi lagi ragara hamārī | baraum̐ sammu na ta rahaum̐ kuārī ||
tajaum̐ na nārada kara upadesū | āpu kahahim̐ sata bāra mahesū ||

81.4

मैं पाँ परउँ कहइ जगदम्बा । तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलम्बा ॥
देखि प्रेम बोले मुनि ज्ञानी । जय जय जगदम्बिके भवानी ॥

maiṃ pām̐ paraum̐ kahai jagadambā | tumha gṛha gavanahu bhayau bilambā ||
dekhi prema bole muni jñānī | jaya jaya jagadambike bhavānī ||

दो॰ 81दोहा

तुम्ह माया भगवान सिव, सकल जगत पितु मातु ।
नाइ चरन सिर मुनि चले, पुनि पुनि हरषित गातु ॥

tumha māyā bhagavāna siva, sakala jagata pitu mātu |
nāi carana sira muni cale, puni puni haraṣita gātu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0