पार्वती बोलीं, हे मुनीश्वरो, यदि आप पहले मिलते तो मैं आपकी सीख सिर पर रखकर मान लेती। अब मैंने शम्भु के लिए जन्म हार दिया है, अब गुण दोष का विचार कौन करे? करोड़ जन्मों तक मेरा यही हठ रहेगा कि शम्भु से ही विवाह करूँगी, नहीं तो कुँआरी रहूँगी। स्वयं महेश सौ बार कहें, तब भी नारद का उपदेश नहीं छोड़ूँगी। जगदम्बा बोलीं, मैं आपके पाँव पड़ती हूँ, आप घर जाइए, देर हो गई। प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले, हे जगदम्बिके भवानी, आपकी जय हो। आप माया हैं और शिव भगवान हैं, आप दोनों सारे जगत के माता पिता हैं। चरणों में सिर नवाकर मुनि पुलकित होकर चले।