दच्छ-सुतन्ह उपदेसेन्हि जाई । तिन्ह फिरि भवन न देखा आई ॥
चित्रकेतु कर घर उन घाला । कनककसिपु कर पुनि अस हाला ॥
daccha-sutanha upadesenhi jāī | tinha phiri bhavana na dekhā āī ||
citraketu kara ghara una ghālā | kanakakasipu kara puni asa hālā ||
5 श्लोक · 79 में से 361
परीक्षा लेते हुए ऋषि नारद की निन्दा करते हैं। उन्होंने दक्ष के पुत्रों को उपदेश दिया, वे फिर कभी घर लौटकर न आए। चित्रकेतु का घर उन्होंने उजाड़ा, हिरण्यकशिपु का भी यही हाल किया। जो स्त्री पुरुष नारद की सीख सुनते हैं, वे घर छोड़कर अवश्य भिखारी हो जाते हैं। उन्हीं के वचन पर विश्वास करके तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभाव से उदासीन, गुणहीन, निर्लज्ज, कपाली, घरहीन और दिगम्बर है। ऐसे वर से क्या सुख मिलेगा? तुम ठग के बहकावे में भूल गईं। पंचों के कहने से शिव ने सती से विवाह किया, फिर उसे त्यागकर मरवा डाला। अब वे भीख माँगकर खाते और सुख से सोते हैं। स्वभाव से अकेले के घर क्या कभी स्त्री टिक सकती है?
दच्छ-सुतन्ह उपदेसेन्हि जाई । तिन्ह फिरि भवन न देखा आई ॥
चित्रकेतु कर घर उन घाला । कनककसिपु कर पुनि अस हाला ॥
daccha-sutanha upadesenhi jāī | tinha phiri bhavana na dekhā āī ||
citraketu kara ghara una ghālā | kanakakasipu kara puni asa hālā ||
नारद सिख जे सुनहिँ नर नारी । अवसि होहिँ तजि भवन भिखारी ॥
मन कपटी तन-सज्जन चीन्हा । आपु सरिस सबही चह कीन्हा ॥
nārada sikha je sunahim̐ nara nārī | avasi hohim̐ taji bhavana bhikhārī ||
mana kapaṭī tana-sajjana cīnhā | āpu sarisa sabahī caha kīnhā ||
तेहि कें बचन मानि बिस्वासा । तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा ॥
निर्गुन निलज कुबेष कपाली । अकुल अगेह दिगम्बर ब्याली ॥
tehi keṃ bacana māni bisvāsā | tumha cāhahu pati sahaja udāsā ||
nirguna nilaja kubeṣa kapālī | akula ageha digambara byālī ||
कहहु कवन सुख अस बर पाये । भल भूलिहु ठग के बौराये ॥
पञ्च कहें सिवँ सती बिबाही । पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही ॥
kahahu kavana sukha asa bara pāye | bhala bhūlihu ṭhaga ke baurāye ||
pañca kaheṃ sivam̐ satī bibāhī | puni avaḍeri marāenhi tāhī ||
अब सुख सोवत सोच नहिँ, भीख माँगि भव खाहिँ ।
सहज-एकाकिन्ह के भवन, कबहुँ कि नारि खटाहिं ॥
aba sukha sovata soca nahim̐, bhīkha mām̐gi bhava khāhim̐ |
sahaja-ekākinha ke bhavana, kabahum̐ ki nāri khaṭāhiṃ ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0