ऐसा कहकर मुनि ब्रह्मलोक चले गए। अब आगे का चरित सुनो। पति को एकान्त में पाकर मैना बोलीं, हे नाथ, मैं मुनि की बात नहीं समझी। यदि घर, वर और कुल अनुपम हों और कन्या के योग्य हों, तो विवाह कीजिए, नहीं तो कन्या कुँआरी ही रहे, क्योंकि उमा मुझे प्राणों से प्यारी है। यदि गिरिजा के योग्य वर न मिला, तो सब कहेंगे कि पर्वत स्वभाव से ही जड़ है। यही सोचकर ऐसा विवाह कीजिए कि फिर हृदय में जलन न हो। ऐसा कहकर वे आँसू भरे चरणों पर गिर पड़ीं। गिरिराज स्नेह से बोले, चाहे चन्द्रमा में आग प्रकट हो जाए, पर नारद का वचन झूठा नहीं होगा। हे प्रिये, सब चिन्ता छोड़कर श्रीभगवान का स्मरण करो, जिसने पार्वती को रचा है, वही कल्याण करेगा।